Wednesday, 5 March 2025

बिखर गई कलिकाएँ

बिखर गई कलिकाएँ

सजल नयन
निमिष गहन
स्वप्न श्याम हो चले बुझे निश्वासों में जल
हर तृण, हर कण तेरे पथ की धूलि मल
अन्तर में गूँजी उजली-धुँधली गूँज पुरानी
लिख चले अश्रुजल फिर से करुण कहानी
         अक्षर अक्षर ले सत्वर धार चले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

सघन विरल
जन्म मरण
क्षत विक्षत इस ललाट की आभा चन्दन
वे कालग्रसित थे झरे पात, ले उड़ा पवन
इस नीरव पथ में बसी शून्य की अभिमानी
विधना के आलेख मरण की अमिट कहानी
         अविनश्वर नभ-पथ प्राण चले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

अक्षर अक्षर
खाली अम्बर
रजनी का कोरा अंचल तारक चंदा बिन
क्या पाती कह पाती बातें ये अक्षर बिन?
टूटी वीणा तन्त्री से कब निकली अमृत वाणी 
शूलों ने निज भाषा में पग पर लिखी कहानी
         पतझड़ में उपवन ने हाथ मले
         बिखर गई वह कलिका बिना खिले

रामनारायण सोनी
६.३.२५

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