सम्पूर्ण पुस्तक युनिकोड
आत्मिका
ऐ गीत मेरे तू गाता चल
गीत क्या है, उसके गुण क्या क्या हैं, लक्षण क्या क्या हैं? उसकी संरचना के और प्रसंस्करण के नियम क्या क्या हैं? ये प्रश्न गीत की बहती सरिता के तटों पर सदैव खड़े रहते हैं। कदाचित् इन के बीच में अगर ये गीत बह नहीं पाये, कुछ कह नहीं पाये, संयत रह नहीं पाये तो श्रम व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में वे काव्य तो हो सकते हैं पर गीत नहीं। प्रस्तुत कृति में दो गीत ऐसे हैं जो आपको शायद इन प्रश्नों के सूक्ष्म उत्तर खोजते हुए से लगेंगे।
मैं समझता हूँ कि गीत की प्रथम प्रस्तुति लोकगीत ही रही होगी जो एक आम आदमी के मन में उपजे भावों की सहज गुनगुनाहट ही रही होगी, जो किसी शास्त्रीय बंधनों को जानती ही नहीं होगी। जैसे ये भँवरे नहीं जानते कि उनके पंखों का स्पन्दन एक संगीतबद्ध संरचना का सहज निर्माण कर देते हैं। पपीहा अपनी मौज में जब स्वाति नक्षत्र की बूँद मिलने के आनन्द में पिऊ पिऊ बोलता है तो वे स्वर गीत हो उठते हैं। भँवरों को सबसे निकट से फूल सुनते हैं, भाव विभोर हो जाते हैं और शायद इसीलिये अपना पराग सिर्फ सौंपते ही नहीं उन पर इसका आलेपन भी उन पर कर देते हैं।
इसी अवधारणा से उत्प्रेरित ये ५१ गीत मुझ में सहज ही में उतर आये हैं। त्रिपथगा गंगा का ही एक नाम है जो हिमालय के तीन स्रोतों से निकल कर आती है और देव प्रयाग में आकर मिल जाती है यहीं से यह गंगा हो जाती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि गीत में बहती है त्रिपथगा। इस गीत संग्रह के एक गीत की ये पंक्तियाँ कहती हैं जिसका शीर्षक है - गीत में बहती है त्रिपथगा।
अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
इन सभी गीतों को संभवतः संगीतमय धुन और स्वर के साथ गाया जा सकता है। इसे एकल, युगल और कोरस में भी गाया जा सकता है। मैं यह नहीं जानता कि ये कौन से छन्द हैं? ये किस शास्त्रीय अनुशासन की फ्रेम में फिट होंगे, या नहीं होंगे पर ये सहज सी भ्रमर गुंजार जैसे हैं। एक और प्रेरणा इन में संलिप्त सी है - जैसे प्रसाद की कृति 'आँसू' में आँसू, महादेवी के काव्य में 'दीपक' उनके श्रेष्ठ आलम्बन ले कर साकार हुए हैं उसी तरह इस कृति के आलम्बन बने ‘गीत’ कहीं कहीं कुछ सुनने, समझने और कहने लगते हैं। कहीं कहीं ये आप से सीधे-सीधे संवाद भी करते लगेंगे। इन्हें बस आपका स्नेह और आशीष चाहिये।
मैंने इनसे कहा है :-
रस - सागर
भर - गागर
पद-पद नव-नागर छन्द भरो!
जन-जन का गौरव शीश धरो!
स्वर-वैभव क्षण क्षण कण्ठ जगे
ऐसा नित नवल विधान करो!
ऐ गीत मेरे तू गाता चल
ले ले तू सप्तक साध सरल
रामनारायण सोनी
25 ए, ब्रजेश्वरी मैन, इन्दौर
चलभाष - 9340761477
श्री राम नारायण जी सोनी साहित्य जगत के देदीप्यमान नक्षत्र हैं। मुझे उनके कविता संग्रहों के आस्वाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
उनकी सभी कविताओं में वेद, उपनिषद एवं श्रीमद्भगवद्गीता का सार पुष्प में पराग की तरह होता है। आज उनके काव्य उपवन से गुजरते हुए सार रस पान करने के लिए मन भ्रमर आकुलित हो रहा है किंतु यह पराग सुलभ नहीं है, मंथन से तत्व निकलता है, श्री राम नारायण जी सोनी की कविता का आस्वाद भी मंथन से ही संभव है।
श्री सोनी जी का सद्य आगमित कविता संग्रह “रजत रश्मि” के गीतों का सृजन एवं उसका अंत: कलेवर श्री सोनी के स्व निर्मित ग्राफिक्स पर हुआ है। यह नवीन प्रयोग उनके कुशल अभियंता होने के कारण संभव होकर अधिक कौशल और सूक्ष्मता से मंडित एक भव्य और मृदुल कलेवर के रूप में पाठकों के हाथों में है। इसके लिए आदरणीय श्री सोनी जी बधाई के पात्र हैं।
मैंने इस संग्रह की कविताएं पढीं । "क्षिति जल पावक गगन समीरा" के साथ आर्ष साहित्य के गहन अध्ययन ने मिलकर जिस काव्य को सृजित किया है वह एक तरल स्वप्न जैसा है। इसमें स्वर्णिम रश्मियों और रजत ऊर्मियों की अठखेलियां हैं तो पवन के झोंकों से उड़ती स्वर लहरियाँ संगीत बन हृदयों को सरसराती हैं।
प्रकृति से ऊष्मा पाकर ही "रसो वै स:" का उद्गम होता है जब कवि की भावनाएँ अपने मन्तव्य के अनुकूल प्रसाद और महादेवी जैसे दैवीय व्यक्तित्वों के रथ चक्रों के चिह्नों पर चलने को आतुर होता है और तब “रजत रश्मि” जैसी कृतियाँ अवतरित होती हैं।
अस्तु!
श्रद्धेय श्री राम नारायण सोनी जी के लिये अपनी समस्त सदेच्छाओं की शक्ति के साथ माँ वाग्देवी से प्रार्थना करती हूं कि माँ उनकी लेखनी को और अधिक प्रशस्त और यशस्वी बनावे, उन्हें स्वस्थ जीवन के साथ दीर्घायु प्रदान करें और वह अपनी लेखनी के नित नवीन सृजन से माँ सरस्वती के चरणों में पुष्प अर्पित करते रहें।
इत्यलम्।
डॉक्टर जया पाठक
पूर्व प्राध्यापक,
उच्च शिक्षा म.प्र.भोपाल
रामनवमी 2025
अनुक्रमण
1 अभिनव मन का श्रृंगार रहे
2 गाले तू मन, अभंग
3 बिखर गई कलिकाएँ
4 आकुल उर का कण कण है
5 यह कैसा सुख है
6 तू अमल - तरल
7 प्रकृति और मनुज
8 प्राण ! तुम जब से गये हो
9 अर्चना का गीत हूँ
10 जर- नीड़ में
11 तुम अनन्त के राही हो
12 गीत तुम पाती बनो तो!
13 शब्दों की प्रतिच्छाया
14 विष-पायी मीरा
15 अश्रु का स्वाभिमान
16 फिर से सजें हम
17 तू गाता चल!
18 गीत में बहती त्रिपथगा
19 वागर्थ
20 गीत के अनुनाद सुन
21 गीत! मेरे तुम विहग वर
22 नेहिल-नीर बिन्दु
23 उठ कर गिरूँ
24 फिर से अलसाये गीत जगे
25 लौट जाओ फिर वहीं तुम!
26 तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
27 राष्ट्र देव
28 जैसे तुम आई
29 हहर हहर बह रे निर्झर
30 मेरे जीवन के भोले स्वप्न
31 आस के बादल न बिखरे
33 गीत अधरों पर धरे हैं
34 रास रमने की घड़ी है
35 कहाँ ले जाता मुझको मौन
36 योगिनी हो कर खड़ी है
37 ये विकल नयन
38 नयन नीर से भरे भरे
39 विपुल वेदना
40 सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
41 गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा
42 भोर की संकल्पना
43 स्वप्न गीले
44 बन्धनों को तोड़ आओ
45 विकल मेघ
46 प्यास अधरों पर धरूँगा
47 मधुगीत गुन गुन कर रहा
48 दीप मैं अविचल अकम्पित
49 गीत में भी घुन लगे
50 मिलन बेला
51 मेघ बन कर देखता हूँ
अभिनव मन का श्रृंगार रहे
पथ में शूल बिछे कितने
तरु से फूल झरे कितने
लोचन को अपने मूंद-मूँद
करुणा क्षरती यह बूँद-बूँद
पथ, शूलों का आधार समझ
गत, फूलों का अधिकार समझ
कितने पल हार लिये अब तक
हर पथ के शूल गिनें कब तक
गतिमय जीवन की धार रहे
अभिनव मन का श्रृंगार रहे
तारक में छिपती उल्काएँ
मधु-रस में लिपटी छलनाएँ
इन कनक घंटों में तृषा भरी
स्वप्नों की पलकें क्षार भरी
अमृत के पहले वह विष होगा
मन्थन जीवन हित करना होगा
प्रलयों के वार सहे अब तक
हर पथ के शूल गिनें कब तक
पंकज सा जीवन-सार रहे
अभिनव मन का श्रृंगार रहे
गाले तू मन, अभंग
मैं शब्द-स्वरों का स्वन-संगम
चिर मौन गलित नीरव तरंग
उर-अम्बर का सुधि-नीलांचल
मैं तड़ित-रुचिर घन वीचि-भंग
लघु-जीवन का निस्सीम क्षितिज
प्राणों में बजती जल-तरंग
गा ले मौजों में मन, अभंग
मैं शुचि श्रुतियों का उद्गाता
गति है गंगा सी धार विरल
प्राची के रोहित अश्वों का
हिन-हिन हूँ अनुनाद विकल
लघु-दीप तमी के भुज प्रलंब
श्वासों में उमड़ी चिर उमंग
गा ले मौजों में मन, अभंग
उस बूढ़े वट की शाखा पर
तिनको का सुन्दर शीशमहल
शैशव का वैभव पाया था
भूलूँ कैसे सौभाग्य विपुल
लघु-बीन वृहद स्वर सागर में
आह्लाद गीत का अंग अंग
गा ले मौजों में मन, अभंग
बिखर गई कलिकाएँ
सजल नयन
निमिष गहन
स्वप्न श्याम हो चले बुझे निश्वासों में जल
हर तृण, हर कण तेरे पथ की धूलि मल
अन्तर में गूँजी उजली-धुँधली गूँज पुरानी
लिख चले अश्रुजल फिर से करुण कहानी
अक्षर अक्षर ले सत्वर धार चले
बिखर गई वह कलिका बिना खिले
सघन विरल
जन्म मरण
क्षत विक्षत इस ललाट की आभा चन्दन
वे कालग्रसित थे झरे पात, ले उड़ा पवन
इस नीरव पथ में बसी शून्य की अभिमानी
विधना के आलेख मरण की अमिट कहानी
अविनश्वर नभ-पथ प्राण चले
बिखर गई वह कलिका बिना खिले
अक्षर अक्षर
खाली अम्बर
रजनी का कोरा अंचल तारक चंदा बिन
क्या पाती कह पाती बातें ये अक्षर बिन?
टूटी वीणा तन्त्री से कब निकली अमृत वाणी
शूलों ने निज भाषा में पग पर लिखी कहानी
पतझड़ में उपवन ने हाथ मले
बिखर गई वह कलिका बिना खिले
आकुल उर का कण कण है
मेरे अन्तर के आँगन में
अब के रिमझिम सावन में
हैं उसी नेह के फूल, उसी ने बोये हैं
उर उर्वि में पाले मैंने
मृदु स्वप्नों में ढाले मैंने
बड़े यत्न से फिर, सुन्दर थाल संजोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन हैं
आकुल उर का कण कण है
ले लो तुम अंजुरि में धर लो
अपनी खाली झोली भर लो
ये विकल हृदय की, तड़पन में भिगोये हैं
कण्ठ रुद्ध है, कैसे गाऊँ
थके पगों से कैसे जाऊँ
गीत शब्द-भावों के, मोती माल पिरोये हैं
ये गीत नहीं स्पन्दन है
आकुल उर का कण कण है
यह कैसा सुख है
मेरे सूने थे खाली पल
निस्तरंग था ठहरा जल
बिम्ब सलोने सपने सा
उभरा लहरों संग अमल
इक सिहर जगी है इस तन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
अंबुद के इन फाहों में
झाँकी किरणें द्युति-मती
नभ के नील-पटल पर
आरेखित जैसे मदन-रती
शिखि सा मन झूमा नर्तन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
यह देख दृगों में अश्रु भरे
छवि तेरी धूसर धूर हुई
यादों की गठरी खुलते ही
वेदना हृदय में पूर हुई
यह कैसा सुख है क्रन्दन में
छाई छवि छैल मुखर मन में
तू अमल - तरल
तू अमल - तरल
हो सहज - सरल
उठ गीत सज्ज है नव-विहान
ऊषा का अरुणिम नभ वितान
भर अपनी लय में अंगराग
गा ले सविता के स्वस्ति-गान
बीती तम घन की अमानिशा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
तू झर - झर कर
कर हहर - हहर
स्वर्णिम कलशों से श्रृंग शिखर
जगती का कण-कण रहा निखर
कूजित कलरव कलहंसों का
तू मिला स्वरों में अपना स्वर
प्यासी रजनी की बुझी तृषा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
मुखर - प्रखर
उभर - निखर
शलभों में, कोमल कलिका में
लास्य, हास्य, उल्लास जगा
तू भी अब शब्दों- छन्दों में
मधुस्वर में मीठी तान जगा
धरणी में सौरभ-मान लसा
ज्योतित हैं जग की दसों दिशा
प्रकृति और मनुज
उदधि अहर्निश बिना थके ही
निज-उर का मंथन करता है
खार-खार का पिये हलाहल
जग में मृदु-जल भरता है
तप कर भी यह सिन्धु हमें क्या
विकल वेदना कह पाता है
पुष्प खिले लघु-जीवन लेकर
बिखर-बिखर माटी में सोये
अपनी मधु के आसव-घट से
कितने ही मधुमास संजोये
लघुता से शापित हो कर भी
निज सर्वस्व लुटा जाता है
ज्वाल वर्तिका अपने माथे
धर कर भी सिंचन करती है
चाहे कितनी जले-तपे फिर
द्रव चुकने पर खुद जलती है
उसका तन-मन, सारा जीवन
फिर से लौट नहीं पाता है
किन्तु मनुज की बगुले सी ही
दृष्टि लोभ की मछली पर है
पहने मोहक मुखर मुखौटे
काजल सा काला अन्तर है
भर कर भारी धन की गठरी
साथ कभी क्या ले जाता है
प्राण ! तुम जब से गये हो
प्राण! तुम जब से गए हो
उपवनों से रूठ कर वह
फिर नहीं मधुमास लौटा
टेसुओं के तप्त उर में
बस अगन का ताप छूटा
अब निरा-पतझार ठहरा
प्राण! तुम जब से गए हो
वेणु से उर की निकलते
बस विरागी स्वर बिचारे
चीर के इस यामिनी के
पड़ गये धूमिल सितारे
हर शिरा में शून्य पसरा
प्राण! तुम जब से गए हो
अनछुई, जागी छुअन क्यों
हो रही बोली अबोली
कुछ पलों की याद से ही
अश्रु ने आँखें भिंगो ली
हर दिशा खुद राह तकती
प्राण! तुम जब से गए हो
अर्चना का गीत हूँ
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ
मैं बँधा हूँ काल में संसार सा
मैं गुँथा हूँ शब्द में, इक हार सा
उपवनों से सुमन की गंध लेकर
अंजली में प्रीत के उपहार सा
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ
पंथ में आरोह भी अवरोह भी
प्रेम के आलाप भी स्नेह भी
नृत्य करते इन पदों में घूँघरू
थाप में थिरकन भरे अवलेह भी
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ
अंग में प्रत्यंग में मेरे समर्पण
भावना में बद्ध मेरा सज्ज अर्पण
मन विरंजित साधना के अर्क से
सर्व निज मद-मान का हो विसर्जन
मैं प्रणय के देवता की अर्चना का गीत हूँ
जर- नीड़ में
गीत की स्वर-उर्मियों में
चेतना-त्वर-अश्व दौड़े
विरह के घन-तिमिर फैले
वेदना निश्वास छोड़े
स्वप्न के पाँखी रुपहली भोर में
जा छिपे हैं वे विवर की ठौर में
जड़-पलक ठहरी बरुनियाँ
अश्रु कण मसि-कोर ठहरे
निर्निमेषी शिथिल पुतली
हैं छोड़ती प्रश्वास गहरे
शून्य से सूने क्षितिज के छोर में
जागता यह कम्प घुल-घुल पोर में
दूर वासन्ती खड़ी है व्यंग्यना
यह क्यों पिकी भी मौन हैं
शाख के घन-पल्लवों में
झाँकता जर-नीड़ से यह कौन है
बुझ चले तारक निशा की क्रोड़ में
भैरवी के खो चले स्वर, शोर में
तुम अनन्त के राही हो
तुम अनन्त के राही हो
यह जीवन-पथ है शूल भरा
यह शापित अम्बर धूल भरा
पद पद पर दुर्दम बाधाएँ
हर दिश से आती छलनाएँ
सम्हलो ! अनन्त के राही तुम
ऐसे क्षण नहीं सदा होंगे
ऋतु बदली वह शिशिर गया
नव अंकुर का नव जनम हुआ
भूलो रजनी के तम-घन को
खिलने दो बोझिल तन मन को
कब पतझड़ बारह मास रहे
इक दिन ये भी विदा होंगे
फेंको संशय के वल्कल को
देखो खिलते इन शतदल को
जग सारा एक समर - वन है
आशा इक दिव्य अमर धन है
अपने भुज नित्य प्रलम्ब रहे
अन्तिम फल जय-प्रदा होंगे
गीत तुम पाती बनो तो!
सीख लो तुम शून्य - पथ में
पवन की गति संग उड़ना
पंख पर मेरे मृदुल से
अश्रु के उपहार धरना
इस पुलक की, अश्रु जल की
स्नेह की पाती बनो तो !
प्रिय - प्रवासी गीत तुम इस
नभ - निलय में खो न जाना
संवरण में लोभ के घन,
पथ - भ्रमित तुम हो न जाना
विकल मन की वेदना की
प्रेय की पाती बनो तो
जिस नगर की वीथियों में
सन्दली सौरभ प्रिया की
खटखटा प्रिय - द्वार को फिर
खोलना पाती जिया की
चिर विरह की इस तपन की
अश्रुमय पाती बनो तो !
शब्दों की प्रतिच्छाया
मसि से अंकित काया में
भावों के रंग संजोता हूँ
नीरव रजनी के तारक के
मैं चुन-चुन माल पिरोता हूँ
सुमनों के सौरभ अर्क लसी
मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ
प्रिय! और निकट आओ तो
जीवन-मधु-प्राश कराऊँगा
कटुता के कंटक बीन-बीन
मधुरिम पाथेय जिमाऊँगा
यायावर उँगली थाम चलो
मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ
स्वर-ताल-छन्द की सरिता में
थोड़ा अवगाहन कर देखो
तट के नत हैं तरु-तमाल
इनमें रस-साल मला देखो
स्वर-वैभव गौरव गान सुनो
मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ
जीवन के खुलते पृष्ठों में
अनुभव का है अमरकोष
हत आशा है कुछ कहीं कहीं,
कहीं समर का विजय घोष
इन गीतों का सम्मान करो
मैं शब्दों की प्रतिछाया हूँ
विष-पायी मीरा
वाणी विष-पायी मीरा की
कैसे अमृत की धार बनी
गीतों में, छन्दों, भावों में
कैसे जन जन का गान बनी
उस अनन्य के आश्रय में
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
विश्वास मेरु सा दृढ़ स्थिर
गीतों में कृष्ण उतर आया
इकतारे का तार तुन-तुना
उसमें घनश्याम उभर आया
चिर-विश्रान्ति-निलय में
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
सुधि के पल पुलकित हैं
प्राण में उत्सव रंजित है
जहाँ छाया भी लगती 'श्याम'
यही छबि उर में अंकित है
हार की ही अन्तिम विजय
शूलों में भी फूलों की गति-लय है
अश्रु का स्वाभिमान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
नयनों की पुतली तैर तैर
रज निगल गई खारा खारा
दा संपुट बीच पला मोती
द्रव दौड़ रहा मारा मारा
दो पल को चमका दिव्यमान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कठिन क्षितिज की कारा से
मृदु-स्वप्न न बन्दी छूट सके
नियति नटी की पीड़ा को
कुछ पल को भी न भूल सके
करुणा का हतप्रभ तृप्ति-दान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कोमल कलिका के अन्तस में
मुदमय मधुसंचय पलता है
पर विकास के पल में फिर
उसका लुट जाना खलता है
फिर भी वह करती सुरभि-दान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
कुन्दन की खूब तपी काया
तुमको सौदर्य नजर आया
कोयल का तो मर्म जला, पर
तुमको केवल स्वर भाया
टूटा मन करता स्वस्ति-गान
झर गया अश्रु का स्वाभिमान
फिर से सजें हम
प्रार्थना में बस तपन है
श्वाँस में केवल अगन है
गीत क्या तुम देव को, इस तरह छलते रहोगे
क्या अधूरी, अधजली ही आस में जलते रहोगे
पाश में क्यों मोह के हम?
दूध बिगड़ा, क्यों मथें हम
संस्तुति के स्वर पनीले
इन तन्त्रियों के तार ढीले
काँपते वागर्थ से तुम, पथभ्रष्ट ही होते रहोगे
गठरियाँ बेचैनियों की, क्या सदा ढोते रहोगे
तीव्र कुण्ठा से ग्रसें क्यों
प्रबल पंखों से उड़ें हम
मेघ बिन आकाश नीरव
शरद में श्री हीन पल्लव
उसरों में बीज श्रम के, व्यर्थ ही बोते रहोगे
शक्तियाँ तुममें अपरिमित, क्या युँही खोते रहोगे
मरु-मृदा का मान कैसा
तरु-लता से फिर सजें हम
तू गाता चल!
अक्षर - अक्षर
मन्थर - मन्थर
गति का मुदमय मंगल-स्वन
दिक के नूपुर करते रुन झुन
नभ में नव नीरद नाद घुले
मन के शिखि पग जागा नर्तन
ऐ गीत मेरे तू लय-पथ चल
बो ले तू उर-उर बीज विरल
अनघ - अमल
तरल - विरल
ओ नीरव सर के नीलकमल!
चिर समाधि में रत अविचल
पत्रों पर मुखरित मुक्ताहल
तल-ताल तरंगित हो उर्मिल
ऐ गीत मेरे तू हो झिलमिल
भर ले तू अन्तर्नाद विमल
रस - सागर
भर - गागर
पद-पद नव-नागर छन्द भरो!
जन-जन का गौरव शीश धरो!
स्वर-वैभव क्षण क्षण कण्ठ जगे
ऐसा नित नवल विधान करो!
ऐ गीत मेरे तू गाता चल
ले ले तू सप्तक साध सरल
गीत में बहती त्रिपथगा
अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
गीत में बहती त्रिपथगा
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
हिमशिखर का पय पिघल पावन हुआ
पाहनों का स्नेह से, निर्झरों ने तन छुआ
उत्स के, सद्धर्म के द्रव ले कर बही यह
गीत-गंगा ने समर्पित प्रीत का सागर छुआ
प्रीत की देवापगा की
इस सुधा का पान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
आदियुग से धार में है ऋत ऋचायें बह रही
चिर सनातन-संस्कृति की गूढ़ गाथा कह रही
गीत-गंगा, सदा नीरा, रव कलित कल कल
नव-रसों से शुभसृजन कर अमृता नित भर रही
संस्तुति माँ शारदे की
स्वस्ति के शुभगान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
वागर्थ
शब्द में क्यों घोल कर विष
घूँट भर मुझको पिलाया
गीत! मैं था नीड़ में नीरव पड़ा
क्यों झिंझोड़ा? क्यों जगाया?
मित्र हो या वैर का प्रतिमान तुम
चेतना या चिन्तना के गान तुम?
जान कर भी कण्ठ में तुमको बसाया
अर्थ शब्दों से विलग क्यों
भाव की भव भूमि रोती
याद के संपुट पुटों में
अधपके उपजाय मोती
क्यों भरे पतझड़ मेरे मधुमास में
व्यंग्यना अतिरंजना के गान तुम
मान कर भी अलख तेरा ही जगाया
सृजन के संकल्प
तुम प्रणय के गीत हो या
हो प्रयाणों के प्रलय पल
रुक गये यदि हो विकम्पित
लह न पाये धार अविरल
मृत्यु तुमको ढूँढ लेगी, पाहनों के प्रस्तरों में
शब्द की इस देह में, भाव के घन विह्वरों में
स्वर-सुधा का पान कर लो
गति-साध का आधान कर लो
अग्नि-शर या विपुल बाधा
कंटकित या हो सुमन-पथ
जब साधना की सिद्धि में
कर रहा हो स्वेद लथ-पथ
रत रथी हो या विरथ हो, दुरभि पल में या वरों में
लक्ष्य के संकल्प के थिर, सत्यव्रत हों निज करों में
जयति-जय का गान कर लो
स्वर-नाद का अवधान कर लो
गीत के अनुनाद सुन
हीरकों के नत निमन्त्रण
स्निग्ध स्वर का विस्तरण
मुग्ध - अक्षर
पुलक - मर्मर
ज्योति के आलोक पथ में, गीत के स्पन्द बिखरे
आज अन्तर ने उँडेला, लास्य-मय रस रंग उभरे
रागिनी! तुम भी चलो
विद्रुमों के नवल वल्कल
सुमन सौरभ बहे अविरल
उर्मि - अर्पण
विरल - दर्पण
रागिनी के ध्वनित रथ में, कर्णप्रिय अनुनाद सँवरे
मुदित मन की तन्त्रियों में, नव सुकोमल छ्न्द उतरे
कामिनी! तुम भी सुनो
सद्य अरुणिम रश्मि प्राशन
उर धरा का लोल आनन
गा - प्रभाती
रज - सुनाती
द्रुत विलम्बित प्रगत गत में, भैरवी के गान निखरे
स्वर अलिन्दों के मुखर हो, गीत के मन-प्राण विहरे
स्वामिनी! तुम भी सुनो
गीत! मेरे तुम विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर
नील - अम्बर
चीर - प्रस्तर
रूप लय का ढूँढ लाओ
स्वर्णपथ में दौड़ जाओ
प्रियतमा की लास्य-मय छबि में सँवर कर
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर
अरुण - प्राची
रंग - राची
रश्मियाँ पिचकारियाँ भर
व्योम पीता सोम मन्थर
सुस्मिता के वे हास - मय अस्फुट अधर
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर
तरु - लताएँ
स्वर - सजाएँ
वेणु से मधु रागिनी झर
गा रहे नवगीत निर्झर
कामिनी के रास - मय वे स्वरित नूपुर
देखना थोड़ा विहग वर
छ्न्द के, रस के परों पर
गीत! तुम मेरे विहग वर
नेहिल-नीर बिन्दु
छलके जब नेहिल-बिन्दु नीर
गीतों की अधजल गगरी से
पलकों की कोरी कोरों से
भींगे भींगे से स्वप्नों का, अधिभार लिये आना!
फिर लौट नहीं जाना!
बदली के कोमल आँचल में
टिम-टिम करते तारक जब
लुक-छिप नटखट ठहरे जब
अवगुंठन हो जाने का, स्वीकार लिये आना!
फिर छूट नहीं जाना!
चंचल चितवन की हीर कनी
मन की मुँदरी के बीच मढ़े
दो नयन ठिठक कर रहें खड़े
प्रिय! मौन हृदय की मीठी, मनुहार लिये आना!
फिर भूल नहीं जाना!
कोकिल की, शुक की तान ज़ुड़े
बिखरे सौरभ नव कुसुमों की
स्वर लहरी गूँजे शलभों की
किंकिनी-नूपुर की मृदु सी, झंकार लिये आना!
फिर रूठ नहीं जाना!
उठ कर गिरूँ
संवेदना के सिंधु का मैं
बिन्दु हूँ, तप से तपा हूँ
आरोह का अभिसार ले
श्यामघन में आ छुपा हूँ
मैं उठूँ, उठ कर गिरूँ उन
कण्ठ में प्यासे पड़े जो
ताकते नभ में विकल से
आस में कब से खड़े जो
मैं उठा, उठ कर गिरा हूँ
और गिर कर, फिर उठूँगा
शुष्क वसुधा की शिरा में
तृप्ति ले फिर फिर बहूँगा
मैं गिरूँ वन प्रान्तरों में
कर सकूँ अभिषेक इनका
सृष्टि का पोषण करें, खुद
दान कर निज सम्पदा का
सिन्धु से उठ कर चलूँ
गन्तव्य फिर से सिन्धु हो
पन्थ में पाथेय नित नव
अभिसिक्त हर रज बिन्दु हो
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
इन सुलगे गीतों के तन को
मृदु नेहिल छुअन अपेक्षित है
इसकी क्षत-विक्षत सुधियों का
सहमा मन-प्राण विकंपित है
स्वर के अंचल में गाँठ पड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
विरही इन गीतों की उर्मिल
करुणा-वरुणा अवशेष हुई
टूटा तारक काली रजनी में
अंतिम पथ की अवरेख हुई
वाणी रसना से रूठ खड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
मधु-सिंचित अमृत-कोशों से
अक्षर-अक्षर रस रंग ढले
गीतों के अन्तस में फिर क्यों
तपते स्वप्नों की प्यास पले
शब्दों में तीखी फाँस गड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
इस विकल वेदना ने आ कर
गीतों को पल पल तड़पाया
गूँजा विहान निश्वासों से
अम्बर का जी भी भर आया
क्यों संसृति लिये कृपाण खड़ी
निर्झर सी दो-दो आँख झरी
फिर से अलसाये गीत जगे
गीतों की झिपती पलकों में
थे अभी अभी सपने सोये
जो जागे जुगनू-जंगल में
सिकता में अपने आँसू बोये
फिर से नीरव में प्रेम पगे
फिर से अलसाये गीत जगे
थी एक कहानी दबी छुपी
जिसमें सौरभ थी घुली मिली
उन पोथी के पीले पृष्ठों में
जो दबी मधुर मुस्कान मिली
सूखी पँखुड़ी में प्राण जगे
फिर से अलसाये गीत जगे
फिर कदम्ब की डाली पर
हौले से इन्दु उतर आया
था धवल धरा से उसकी वो
प्रिय का प्रिय बिम्ब उभर आया
हर पोर पोर उल्लास जगे
फिर से अलसाये गीत जगे
तितली के पंख पराग सने
मधु रंजित धूसर-धूलि हुई
गीतों का गात सिहर उठता
जैसे सहसा हो तड़ित छुई
कानन में सौ सौ फाग जगे
फिर से अलसाये गीत जगे
लौट जाओ फिर वहीं तुम!
तुम अभी लौटे क्षितिज से
ले चिट्ठियाँ कोरी करों में
क्या सभी पनिहारियाँ वे
सब मौन थी बैठी घरों में
बिन लिखे संवाद कागज
ए पवन! क्यों ज्वाल लाये
लौट जाओ फिर वहीं तुम!
हिम शिखर की उर्मियों तुम
सब सँदेशे भूल आई
अंक में अपने सुलगते
क्यों विरह के दंश लाई
बिन स्वरों के गीत की तुम
ए लहर! क्यों बात लाई
लौट जाओ फिर वहीं तुम!
नील नभ के ओ प्रवासी
रीते आये उस नगरी से
प्यास बुझेगी मन की कैसे
लाई रीती इस गगरी से
बिना खबर के अग्रदूत तुम
ए मेघ! यों ही व्यर्थ आये
लौट जाओ फिर वहीं तुम!
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
सुप्त अधरों की कलिका में
अचानक जागे क्यों स्पन्द
व्यथा का सूना था यह गाँव
थकित नयनों के पट थे बन्द
हरिक आहट पर देती कान
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
हुए वे सौरभ सब दिग्भ्रान्त
ठगी ठिठकी है चपल पवन
चकित सा यह सूना संसार
उभरती हिय में तीव्र जलन
विकल वीणा के विस्मित तार
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
नियति से नित नूतन संघर्ष
बरसते मेघों से अवसाद
हृदय की धीर धमनियों में
मचाते हैं अतिशय उन्माद
बिछे इन पथ में पागल प्राण
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
प्राण के आकुल कितने प्राण
त्वरा के पग घुँघरू झनके
कपोलों पर तारक से बिन्दु
छलक कर नीरव में ढुलके
जुन्हाई का टूटा अधिमान
तुम्हारा कैसा स्वप्नाकाश
राष्ट्र देव
अपना चिर संचित पुण्यकोष
जग के अरण्य में महका है
विपुल धरा का कण-कण भी
यूँ चंचरीक सा चहका है
ऋषियों की वाणी ऋतम्भरा
हवि संग ऋचाओं का होता
पावन यज्ञों की समिधा से
मंगलमय हवन जहाँ होता
हैं श्रृंगशिखर ये कनक मढ़े
हैं वृक्ष रूप में रोम खड़े
अंगों से बहता पावन जल
इस नग विराट के दान बड़े
भूतल पर बहती सरिताएँ
संस्कृति की ये पुष्ट शिराएँ
श्वेत श्याम इन पाषाणों से
निर्मित देवों की प्रतिमाएँ
भू भाग घिरा जो सीमा से
केवल वह, राष्ट्र नहीं है
जन गण मन भाषा भाव जुड़ें
समझो सब राष्ट्र यही है
उत्तर में उन्नत नग विशाल
केसर सौरभ से लसित भाल
प्राची पश्चिम के भुज प्रलम्ब
उर में संस्कृति की विजय माल
दक्षिण में द्रविड़ धरोहर है
वैभव का मान सरोवर है
आदिकाल की परम्परा का
पालक पोषक तरुवर है
आएँ मिल कर करें वन्दना
राष्ट्र देव की करें अर्चना
विश्व-गगन में, सर्व दिशा में
विजय गान की गूँज-गर्जना
भारत फिर से हो विश्व गुरू
फिर से जानें रघु और पुरू
वसुधा के कोने कोने में
हों फिर से गौरव गान शुरू
राष्ट्र सुरक्षित और सबल हो
कोटि कण्ठ जयघोष करें
कोटि करों से संकल्पों का
जन जन मिल उद्घोष करें
जैसे तुम आई
चंचल चितवन के आतुर से
मृग-शावक दौड़े आते हैं
नभ में आकुल से श्याम मेघ
अलकावालियाँ लहराते हैं
बँकपाँति वेणी सी बीच बीच
सुभगे! तुम अन्तर में आई
रँग रहा मदन यह अन्तर-पट
कुछ बिम्ब निराले औ' नटखट
आगत के स्वागत में विह्वल
उस पंथ बिछे हैं नयन निपट
उज्ज्वल स्मृति की रेख खींच
सुचिते! तुम बदरी सी छाई
इन तृषित नयन की सँझवाती
पुतली के गोलक आराती
दीपित दीपों की कनक किरण
अनुबन्ध मिलन के दोहराती
उर के भावों को सींच सींच
तुम! नव-कलिका सी मुस्काई
सज्जित कानन का पोर पोर
नवअंकुर लखता हो विभोर
झरता पद्मों का पद्मराग
गुम्फित शलभों का मन्द्र शोर
विहगों का मधुरव बीच बीच
शुचिते! हर ओर लगा कि तुम आई
हहर हहर बह रे निर्झर
जल की धारा को दूध बना
निज गिरने को उत्कर्ष बना
माना पाषाण बिछे तल में
उन पर भी धीरे ही बहना
कहो! डरता है मुझसे डर
हहर हहर कर बह निर्झर
रेवा की धारा धुआँ बना
सत का शिव संगीत सुना
गति का रुक जाना मरना है
है बहना जीवन को पाना
वह पथ ना जाय बिसर
हहर हहर कर बह निर्झर
तुझमें इक इन्द्रधनुष होगा
तेरा कण कण भी खुश होगा
तेरी करुणा से तृप्त पवन
तेरा यह धवल वपुष होगा
जगत यूँ जाए ना बिफर
हहर हहर कर बह निर्झर
कलित कल कल करती धार
बाहुओं का दोनों विस्तार
हृदय में अनहद का अनुनाद
पगों में शिला बनी आधार
जगत है सारा एक समर
हहर हहर कर बह निर्झर
शीश पर धारा का अभिषेक
पगों से बहती जल अवरेख
लजीली लतिका की झालर
बने सब अर्चन के आलेख
नियति के फूटे हैं निर्झर
हहर हहर कर बह निर्झर
मेरे जीवन के भोले स्वप्न
सहज ममता की गोद पले
दबी आशाओं का उपवन
सहमते सिकुड़े कृश वे गात
अधखिली कलियों सा बचपन
छुड़ा कर जाता निष्ठुर हाथ
भाग्य ने असमय किया अनाथ
नहीं थे पद में भी पदत्राण
ठिठुरते महाशीत से प्राण
मचा करता तन में रौरव
संभलता उठता गिरता मन
मर्म में सोये स्वर्णिम स्वप्न
बँधाता ढाढस केवल मन
शीश पर केवल नील गगन
हृदय में केवल टीस चुभन
जीवनी केवल थी आधार
कोई था थामे हर धड़कन
चला जब श्रम-निर्झर वह मौन
चला था संग न जाने कौन
टाट के बस्ते रखी किताब
उँगलियों पर था सभी हिसाब
श्याम थी पट्टी, पट भी श्याम
छ्ड़ी का, गुरु का बड़ा रुबाब
गणित का समवेती वह गान
याद है बालसभा का ज्ञान
स्वप्न बादल के छौनों से
उछल कर आते कोनों से
रचा करते नित नूतन बिम्ब
बात करते थे पवनों से
इन्हीं में कितने हुए मगन
इन्हीं ने ढाला है जीवन
स्वप्न थे वे जीवन के गीत
कभी ना बिछड़े ये मनमीत
सभी के अपने हैं संसार
यही है जीवन के संगीत
कभी बतियाता इनसे मन
बना जीवन जिससे मधुबन
आस के बादल न बिखरे
क्षिप्त मन के पृष्ठ पर
अंकित सभी तेरी कथाएँ
क्यों करुण के राग में ये
व्यथित हैं सब गीतिकाएँ
लोचनों की कोर भींगी
स्वप्न के मुक्ता न बिखरे
साँझ का या भोर का नभ
नीरदों का रंग लोहित
संधियाँ दिन की निशा की
संवेग से होती विकम्पित
भित्तियाँ उर की पनीली
गान पीड़ा के न उभरे
सुप्त वंशी के हृदय में
है प्रतीक्षा बस पवन की
रंध्र में स्वर चेतना भर
जिन्दगी जागे विजन की
बिजलियाँ कितनी कँटीली
आस के बादल न बिखरे
कामना के विहग उड़ कर
नीड़ में फिर लौट आये
रात सोयी नभ निलय में
प्राण! तुम ना लौट पाये
वादियाँ मन की रुपहली
उम्र बीती तुम न बिसरे
गीत अधरों पर धरे हैं
गीत मेरे प्रीत की रसगंध ले कर
शब्द सारे भाव के सम्बन्ध ले कर
चिर प्रतीक्षा खुद खड़ी दहलीज पर
सज्ज प्राणों का मुकुल है यह विवर
ओ सुनयने, पंथ का पाथेय ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
तारिका निस्तब्ध अवनी झाँकती सी
दीप की लौ भी पवन से काँपती सी
वृन्द कानन के तृणों में कम्प कैसा
बद्ध छन्दो में घुली तुम आरती सी
ओ सुनयने, कण्ठ का आधार ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
शतदलों के पत्र पर अंकित निमन्त्रण
लोल लहरों में विरंजित लास कण
अंजुरी भर प्रीत का आभार ले कर
सब विसर्जित रूढ़ियों के आवरण
ओ सुनयने, थाल भर श्रृंगार ले
गीत मेरे शुष्क अधरों पर धरे हैं
रास रमने की घड़ी है
ए पवन तुम बाँसुरी में
फिर बहो एक बार आओ
चिर चिरन्तन रागिनी के
फिर मधुर स्वर वे जगाओ
आँगने में इस कुटी के
आ, आज कान्हा फिर पधारे
घन गरजते निज स्वरों में
पग पैंजनी धर आ मयूरा
कण्ठ में मल्हार भर ले
छम छमा, कर नृत्य पूरा
इस सघन छाया-वटी में
आ, आज कान्हा फिर पधारे
झूम लो रे द्रुमदलों तुम
ए लता बन जा हिंडोला
हर बटोही बाट का है
सुध बिसारे पन्थ भूला
उत्सवी नियती नटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
मौन क्यों पाषाण गिरि के
थी छैले छबि तुमने निहारी
वह कामरी काँधे धरे था
यहँ, गोप संग नाचा बिहारी
नाच ले आजा लकुटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
ओ यमुन के तट चलो अब
कुंजरों तुम आ मिलो सब
उठ करो श्रृंगार गिरिवर
गोप, गोसुत फिर मिलें कब
साँवरे की लख लटी तू
आ, आज कान्हा फिर पधारे
आ, रे! पपीहे टेर कर ले
कोकिला मृदु तान भर ले
क्यों उदासी हो कदम्बों
हर दिशा उल्लास भर ले
रास रमने की घड़ी है
आ, आज कान्हा फिर पधारे
कहाँ ले जाता मुझको मौन
सपन सोये हैं हो कर क्लान्त
विकल मन ढूँढ रहा एकान्त
निशा में ठहरा मत्त समीर
मधुप उपवन के हैं दिग्भ्रान्त
अभी मैं लौटा अपने ठाँव
कहाँ ले जाता मुझको मौन
खुले रजनी के श्यामल केश
पलक पट में आशा है शेष
सुमन का सोया है श्रृंगार
अतल के शोर हुए अवशेष
अभी मैं आया अपने गाँव
कहाँ ले जाता मुझको मौन
नील नलिनी के बन्द कपाट
गा चुके विरुदावली भी भाट
स्वाँति के उमड़े जलद सघन
निगलता जाता गगन विराट
अभी हैं थके थके ये पाँव
कहाँ ले जाता मुझको मौन
खड़े क्यों बने बिम्ब उस पार
सरित की मन्थर चलती धार
ललित लतिका के उठते दोल
पुहुप में सौरभ का अधिभार
अभी उन्मन है अपनी नाव
कहाँ ले जाता मुझको मौन
योगिनी हो कर खड़ी है
तुम हृदय की वेदना संचेतना
कोकिला की कूक सी प्रतिवेदना
स्वाँति के घन में धधकती प्यास ले
रट रहा फिर भी पपीहा अनमना
चिर पिपासा इन अधर की
बंदिनी हो कर खड़ी है
हैं लता के पाश में वह मौन तरुवर
खंजनों के नैन हों जैसी रुचिर
मेघना में तड़ित छबि का हास ले
वह कौमुदी के अंक में बंदी भ्रमर
चिर प्रतीक्षा प्रिय मिलन की
मानिनी मन में बड़ी है
यामिनी जो ज्योत्सना का पान करती
स्वाँस में प्रस्वाँस में अनुबन्ध करती
चिर विरह की आग चकवी सह रही
अस्त हो जा चाँद, केवल आस करती
चिर प्रभंजन इस जलन की
योगिनी हो कर खड़ी है
ये विकल नयन
जो हृदय चाहता कहना है
अधरों के पार न हो पाया
पर उमड़े भावों का सागर
रोक नयन भी कब पाया
सागर के छिछले तट देखे
लहरों का आना जाना भी
धो धो कर तेरे अरुण चरण
लौट लौट उनका जाना भी
मन का सागर गहर गहन
दीन मीन अति अकल विकल
बेसुध प्राणोंं वंशी के
स्वर ताल बिंधे स्पन्द विफल
महाशून्य पर क्षितिज घिरा
दुःख की उल्का से भरा भरा
रजनी की स्वप्निल कोरों पर
निष्ठुर तम ने भी खार भरा
सुख दुःख के तुहिन कणों की
यह उम्र कहानी कहती है
आलोक किरण की वय छोटी
कुछ निमिष सुहानी रहती है
सुख के बन्दीजन हार चले
ये कालमेघ भी यहीं गले
सान्ध्य दीप के जलते ही
वैरी कितने पवमान चले
अक्षर जीवन की पाती के
धुँधले धुँधले से लगते हैं
फिर भी यादों भ्रमर सभी
इनके भीतर ही पलते हैं
गीतों के कण्ठ रुँधे से हैं
उत्सव वीणा के मौन पड़े
आशा के धूमिल कोहरे में
विस्मित सरिता-कूल खड़े
सजल नयन की कारा भी
अश्रु भार ना सह पाई
ये कोमल कोमल कलिकाएँ
ना शीत निशा से बच पाई
नयन नीर से भरे भरे
ये नयन नीर से भरे भरे
करुणा की छाया शीश धरे
हैं अब तक ठगे ठगे ठिठके
तेरे पदचिन्हों पर टिके टिके
धोते निज का नित खारा पन
उस मग में चिर करते नर्तन
अब सहज नहीं है सह पाना
कोरों से अंजन बह जाना
प्रिय मिलन विरह के कूलों की
द्वन्द्वो में मूर्छित फूलों की
सौरभ पी भटका पवन कहीं
अणु अणु ने अपनी व्यथा कही
ना प्रिय प्रवास से लौट सका
चिर पीर स्वयं की धो न सका
तम की छलनाएँ छलती हैं
अन्तर की ज्वाल उगलती है
उस दूर क्षितिज की सीमा के
उस पार निठुर सी गरिमा के
प्रियतम का न्यारा नगर वहाँ
चिर सजल नयन की पीर यहाँ
इनके जलप्लावन धुँधलाते
कोरों पर आकर थक जाते
मृदुहास छद्म सा नयनों में
चिर आस प्रीत की अयनों में
ये नयन नीर से भरे भरे
कब तक पीड़ा के घूँट भरे
या तो तुम ही अब आ जाओ
या अपने संग लिवा जाओ
विपुल वेदना
मैंने खारापन सोखा है,
तुमको मृदु जल सींचा है
अर्णव के अतुलित बल से
लड़ कर जीवन खींचा है
स्वर्ण धूलि नभ में बिखरी
सूरज का आतप सह सह कर
छाँह मिले शीतल तुमको
सहा सभी मैंने तप कर
मेरे सपने कुछ बोल गए
अन्तर में पीड़ा घोल गए
नीरव रजनी की पलकों में
क्यों विपुल वेदना घोल गए
तुम अदृश्य हो दृश्यमान
उतरे ले सस्मित महारास
मेघों के उड़ते चीरों पर
अंकित करते प्रिय प्रवास
वीणा के विह्वल तारों में
मधुरव के स्वर मौन पड़े
जीवन की इस कलिका में
कितने कितने प्रतिमान गढ़े
निर्वाणों के वे पथ अनन्त
काली रजनी की है अलकें
लुढ़क लुढ़क जाती मेरी
भारित है मन की पलकें
महाशून्य के पार क्षितिज
सीमा अवरेख हुई जाती
कोमल किसलय कलिकाएँ
ऐसे में कैसे मुस्क्याती?
श्यामल नीरद की छलनाएँ
गलित हृदय में कौंध रही
इन अरुण नयन में अश्रु भरे
देखो तुमको ही खोज रही
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
मेरा क्षणभंगुर जीवन है
हैं नीचे सारे शूल बिछे
सजता सजनी के जूड़े में
साजन का सारा मान रिझे
अपना उर खूब सजाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
आओ मधुपरियाँ तुम आओ
मुझमें मुदमय मकरन्द भरा
चतुर शिल्प की शिल्पी तुम
तुम में शिल्पों का ज्ञान भरा
दे कर निजकोश लजाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
है नहीं दृष्टि में भेद मेरी
क्यों देवों का ही यजन करूँ
उत्सर्ग भरी उन राहों में
खुद ही अपना प्रतिदान धरूँ
यह करते भी शरमाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
पंखुड़ियों में प्रभु ने मेरी
कूट कूट सौंदर्य भरा
जग को यह सारा बाँट सकूँ
हूँ इसीलिये तो भरा भरा
मन में अभिमान न लाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
यह अम्बर खड़ा वितान लिये
यह धरा धरित्री है मेरी
पवन हिंडोला झलता है
यह डाल मयित्री है मेरी
मैं पाकर इन्हें अघाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
चिरऋणी रहूँगा उपवन का
जो गेह हुआ, प्रतिपाल बना
मैं कृतज्ञ उस माली का
जिसने जीवन का तार बुना
यह सोच सोच इठलाता हूँ
सौरभ सब ओर लुटाता हूँ
गीत ने फिर से पुकारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा
स्वप्न जागे, रात सोई,
याद ने माला पिरोई
घन-तिमिर में अश्रुओं ने
आज रूखी आँख धोई
जो लिखी पल ने कहानी
चितवनों ने आज खोई
रागिनी ने तार में खुद को सँवारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा
प्राण में बस एक तुम ही
श्वाँस औ' प्रश्वास तुम ही
चित्त के प्रस्तर तले भी
एक ही अहसास तुम ही
बिम्ब में प्रतिबिम्ब में भी
रूप का प्रतिभास तुम ही
लौट आया है वही मधुमास प्यारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा
श्वाँस में निशिगंध भर लो
प्राण में उल्लास धर लो
पुष्प के शुभ आभरण की
वेणि से श्रृंगार कर लो
यामिनी ना बीत जाए
प्यार से गलबाँह भर लो
इस हृदय में नाम केवल है तुम्हारा
गीत ने मेरे तुम्हें फिर से पुकारा
भोर की संकल्पना
पंथ के प्रहरी विदेही हो चले
पाँखियों के पंख में उत्सव घुले
जागता अभिसार भू के रजकणों में
नवकुसुम के नयन पट हैं अधखुले
प्रात की अंजन शलाका
अरुण अंजन आँजती है
थी अलसती उस विजन की वीथियाँ
जो मुँदी पलकों तले थी सीपियाँ
जागती स्वर ले प्रभाती के मधुर
पनघटों पर आ जुड़ी पनहारियाँ
नीरजा के अंक बैठी वंशिका
ओस को पुचकारती है
सुमन सौरभ की सुरीली अल्पना
है विगत अब शूल की अतिरंजना
मदिर मन्थर सुप्त थे पवमान सारे
जाग उठ्ठी नवकिवरण की कल्पना
नील नभ में नव पताका
ने उतारी आरती है
स्वप्न गीले
उम्र की दहलीज पर ठिठकी कथाएँ
स्वाँस के अधिभार सहती सी व्यथाएँ
प्रात के अरुणार के अंचल घुली सी
साँझ तक लिखती रही खुद व्यंजनाएँ
अश्रुओं के देश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
मन्द्र रव उन दूर बजती थालियों का
तन प्रकम्पित है विसुध सी प्यालियों का
भीत मन की कुक्षियों में प्राण गुम्फित
स्वर विकल हर गुल्म का उन डालियों का
इस विरागी वेश में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
ओ गुजरते पल जरा कुछ देर ठहरो
इस सजल घन वीथि में कुछ और विहरो
शतदलों के पत्र पर मणिमाल शोभित
कंटकों की पगथली कुछ देर बिसरो
इस अपलक उन्मेष में ये
पल पनीले, स्वप्न गीले
बन्धनों को तोड़ आओ
देह मेरी गेह वर्तुल मृत्तिका की
नेह बहता राह गीली वर्तिका की
एक चिनगी आग पी लूँ
आस में कुछ और जी लूँ
सब क्षितिज के बन्धनों को तोड़ आओ
बन्धनों को तोड़ आओ
आँधियों के ताप से जलती दिशाएँ
प्राण आकुल और आकुल है शिराएँ
श्वाँस से अनुबन्ध कर लूँ
खुशबुओं से सन्धि कर लूँ
आवरण सब गर्विता के छोड़ आओ
बन्धनों को तोड़ आओ
क्यों अधूरी प्यास अधरों में पले
अब न कोई स्वप्न अन्तर में जले
स्वरलता में राग भर लूँ
इन मुट्ठियों में रंग धर लूँ
धार जीवन जीवनी की मोड़ आओ
बन्धनों को तोड़ आओ
विकल मेघ
इस असीम सागर में धारा
मेरी भी अब खो जाने दो
थक कर चूर हुई बह बह कर
तन मन सारा चुक जाने दो
तम को इस रजनी ने कैसे
घूँट घूँट दृग मूँद पिया है
भोर हुई तब तुहिन कणों ने
जीवन कैसा क्षणिक जिया है
अभी क्षितिज पर उल्काएँ जो
नक्षत्रों से टूट गिरी हैं
नभ के ऑंगन विकल मेघ में
चंचल चपला रोष भरी है
आलोक बिन्दु पी पी कर ही
उडगन अपने धाम चले
टूटी वंशी के पीड़ित स्वर
अपने तापों से कण्ठ जले
विधु का तन शीतल ज्वाला में
जलता तपता है नीरव में
रजनी भर तारक चूनर में
इतराती अपने वैभव में
करुणा का सिन्धु उबलता है
लख लख कर अपनी छाया ही
मन का मृगशावक दौड़ रहा
लिपटी अधरों पर माया ही
प्यास अधरों पर धरूँगा
स्वाँस के मृदु तन्तु टूटे
भाव के सब बन्ध टूटे
रट रहा फिर भी पपीहा
स्वॉंति के अनुबन्ध खूटे
जुगनुओं से रोशनी की अर्चना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा
पुष्प हैं निस्पन्द सारे
मौन क्यूँ हैं सब दिशाएँ
भीत मन के द्वार आ कर
कँप रही हैं क्यूँ शिराएँ
नेह के इस मेघ से जल-याचना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा
सूखती सी वर्तिका ले
दीप क्या यह जल सकेगा
क्या सुलगती सीपियों में
आस का मोती पलेगा
हो मलय मधुवात मन में प्रार्थना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा
हैं प्रबल लहरें उदधि की
और तरणी क्षीण सी है
रौंदती मन को व्यथाएँ
चेतना कुछ लीन सी है
प्राण की वंशी बजे यह कामना फिर भी करूँगा
सूख जाये कण्ठ चाहे, प्यास अधरों पर धरूँगा
मधुगीत गुन गुन कर रहा
शब्दो के इस महारास में,
अर्थों के मधुरिम प्रभास में
भावों में, अहसासों में, मधुगीत गुन गुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
दो हृदय दो तन विकम्पित,
ताल सुर हैं द्रुत विलंबित
बँध पुलिन में बह रही है
यह धार सरिता की स्वरित।
आगतों के स्वागतों में
पुष्प के मकरन्द मुखरित
घन गरज की भेरियाँ सुन
नाचते है मोर प्रमुदित।।
तार वीणा के जगाने मधुमीत तुन तुन कर रहा है।।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
कोकिला के कंठ जागे,
चातकों के भाग जागे
उपवनों में गंध भारित
चहुँ दिशा में पवन भागे।
ताल में बनफूल पादप
पात ने माँडी नव रंगोली
झर झराती झिरनियों के
मधुरवों के रार जागे।।
श्वाँस में प्रश्वाँस में मनमीत कुन मुन कर रहा है।
मधुगीत गुन गुन कर रहा है।।
दीप मैं अविचल अकम्पित
अंधकार पी पी कर भी तो
मैं ना हारा ना थका कभी
जल कर तप कर भी तूफानों से रत्ती भर ना डरा कभी
मैं वामन ही सही मगर पग मेरा भी ना रुका कभी
जब तक तन में कतरा भी था मेरा सिर ना झुका कभी
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
कुटिया और महलों दोनों में
भेद कभी भी नहीं किया
मन्दिर से मदिरालय तक मैंने इक समान सर्वस्व दिया
सारा जग सोया चैन लिये रजनी भर मैने जाग किया
सन्नाटों और शोरों में भी मैं दीपशिखा आधान किया
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
जलती ज्वाला शीष धरे
अभिसिञ्चन उसका करता हूँ
अन्तिम श्वाँसों के चुकने तक अविरल सेवा करता हूँ
चकाचौंध तो अब जन्मी है मैं इतिहास पुरोधा हूँ
शाश्वत हूँ धरती बेटा और यूँ जीता हूँ ना मरता हूँ।
मैं अपना धर्म निभाता हूँ
हर युग में पूजा जाता हूँ
आज उतरे मेघ मन पर
आज उतरे मेघ मन पर
उर धरा की तृप्ति ले कर
आज अम्बर की पलक पर झुक रहा सावन मुखर।
लोचनों में प्रीत भर कर मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर
क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार ले कर।।
तुम न आये प्यार का
मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर
आय या फिर ना आए।।
तुम प्रणय की रागिनी हो
मैं बुनूँगा गीत मधुरिम
रेशमी फर सी फुहारों का सुनो तुम साज मद्धम।
आज मन का मोर यह कर यहा है नृत्य छमछम
प्राण में सुलगी अनल जो है बढ़ाती प्यास रिमझिम।।
तुम न आये प्यार का
मौसम युहीं ना बीत जाए।
लौट कर यह दिन कहीं फिर
आय या फिर ना आए।।
गीत में भी घुन लगे
गीत में भी घुन लगे
बीज-से सुलने लगे
गा रहे जिसके कथानक
कान मूँदे वे अचानक
शून्य में आलाप पंगु हो गये हैं
जागरण के दीप प्रहरी, सो गये हैं
गीत की क्षुर धार बोथी
जल गई इस बार पोथी
मेंढकों का कूप में जग
यह जिन्दगी दो चार पग
लघु क्षितिज में स्वाँस बन्दी हो गये है
बीन के स्वर-साज सारे, खो गये हैं
खिड़कियाँ सूनी पड़ी है
शून्य से आँखें जुड़ी हैं
गीत की ये मन्द्र ध्वनियाँ
अक्षरों की क्षीण छबियाँ
वीथिका के पथ अनामी हो गये हैं
गीत थे उनके लिये, वे प्रवासी हो गये हैं
मिलन बेला
कलित - करुणा
क्षिप्त - वरुणा
साँझ में पाँखी परों में
गोधुली के रज विरंजित
पलक पुलिनों बीच मुक्ता
अश्रुकन ठहरे विकुण्ठित
वीण उर की मन्द पड़ती जा रही है
नीलिमा नभ की सिमटती जा रही है
दस दिशाएँ
पथ भुलाएँ
पंथ भूला मन बटोही
कंटकित सारी दिशाएँ
श्वाँस का हर तन्तु बोझिल
फिर गूँजती घन गर्जनाएँ
रागिनी की लय बिखरती जा रही है
लघु यामिनी, कल्प होती जा रही है
तप्त लहरें
धूम्र गहरे
इस अलक्षित ध्येय का
कर रहा मरू में विसर्जन
प्यार के पथ में बिछे
अवरोध का तय है विखंडन
मिलन बेला पास आती जा रही है
यह विरह की रात बीती जा रही है
मेघ बन कर देखता हूँ
गीत हूँ पर,
मेघ बन कर देखता हूँ
भाव की मृदु बूँद ले,
रूखे अधर को सीचता हूँ
मैं पवन से,
मन्द सी गति मांगता हूँ
पुष्प-अलि सी वह मधुर,
नित-नवल रति मांगता हूँ
फिर न लौटूंगा कभी,
इस विरह की कन्दरा में
मैं प्रणय के देवता से
प्रिय पर समर्पण मांगता हूँ
गीत हूँ पर,
पुष्प बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ
मैं गगन से,
प्रात की रज मांगता हूँ
बाल रवि ने जो बिखेरी
वो स्वर्ण आभा मांगता हूँ
मैं मलूँगा गीतिका-मुख
स्वर्णमय चिर रोलियों को
मैं गगन से और रवि से
मधुमय विलेपन माँगता हूँ
गीत हूँ पर,
अर्घ्य बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ
No comments:
Post a Comment