पथ में शूल बिछे कितने
तरु से फूल झरे कितने
लोचन को अपने मूंद-मूँद
करुणा क्षरती यह बूँद-बूँद
पथ, शूलों का आधार समझ
गत, फूलों का अधिकार समझ
कितने पल हार लिये अब तक
हर पथ के शूल गिनें कब तक
गतिमय जीवन की धार रहे
अभिनव मन का श्रृंगार रहे
तारक में छिपती उल्काएँ
मधु-रस में लिपटी छलनाएँ
इन कनक घंटों में तृषा भरी
स्वप्नों की पलकें क्षार भरी
अमृत के पहले वह विष होगा
मन्थन जीवन हित करना होगा
प्रलयों के वार सहे अब तक
हर पथ के शूल गिनें कब तक
पंकज सा जीवन-सार रहे
अभिनव मन का श्रृंगार रहे
रामनारायण सोनी
५.३.२५
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