मेघ बन कर देखता हूँ
गीत हूँ पर,
मेघ बन कर देखता हूँ
भाव की मृदु बूँद ले,
रूखे अधर को सीचता हूँ
मैं पवन से,
मन्द सी गति मांगता हूँ
पुष्प-अलि सी वह मधुर,
नित-नवल रति मांगता हूँ
फिर न लौटूंगा कभी,
इस विरह की कन्दरा में
मैं प्रणय के देवता से
प्रिय पर समर्पण मांगता हूँ
गीत हूँ पर,
पुष्प बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ
मैं गगन से,
प्रात की रज मांगता हूँ
बाल रवि ने जो बिखेरी
वो स्वर्ण आभा मांगता हूँ
मैं मलूँगा गीतिका-मुख
स्वर्णमय चिर रोलियों को
मैं गगन से और रवि से
मधुमय विलेपन माँगता हूँ
गीत हूँ पर,
अर्घ्य बन कर देखता हूँ
प्रीत में मन मीत का
संगीत बन कर देखता हूँ
रामनारायण सोनी
७.३.२५
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