कलित - करुणा
क्षिप्त - वरुणा
साँझ में पाँखी परों में
गोधुली के रज विरंजित
पलक पुलिनों बीच मुक्ता
अश्रुकन ठहरे विकुण्ठित
वीण उर की मन्द पड़ती जा रही है
नीलिमा नभ की सिमटती जा रही है
दस दिशाएँ
पथ भुलाएँ
पंथ भूला मन बटोही
कंटकित सारी दिशाएँ
श्वाँस का हर तन्तु बोझिल
फिर गूँजती घन गर्जनाएँ
रागिनी की लय बिखरती जा रही है
लघु यामिनी, कल्प होती जा रही है
तप्त लहरें
धूम्र गहरे
इस अलक्षित ध्येय का
कर रहा मरू में विसर्जन
प्यार के पथ में बिछे
अवरोध का तय है विखंडन
मिलन बेला पास आती जा रही है
यह विरह की रात बीती जा रही है
रामनारायण सोनी
१०.३.२५
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