ऐ गीत मेरे तू गाता चल
गीत क्या है, उसके गुण क्या क्या हैं, लक्षण क्या क्या हैं? उसकी संरचना के और प्रसंस्करण के नियम क्या क्या हैं? ये प्रश्न गीत की बहती सरिता के तटों पर सदैव खड़े रहते हैं। कदाचित् इन के बीच में अगर ये गीत बह नहीं पाये, कुछ कह नहीं पाये, संयत रह नहीं पाये तो श्रम व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में वे काव्य तो हो सकते हैं पर गीत नहीं। प्रस्तुत कृति में दो गीत ऐसे हैं जो आपको शायद इन प्रश्नों के सूक्ष्म उत्तर खोजते हुए से लगेंगे।
मैं समझता हूँ कि गीत की प्रथम प्रस्तुति लोकगीत ही रही होगी जो एक आम आदमी के मन में उपजे भावों की सहज गुनगुनाहट ही रही होगी, जो किसी शास्त्रीय बंधनों को जानती ही नहीं होगी। जैसे ये भँवरे नहीं जानते कि उनके पंखों का स्पन्दन एक संगीतबद्ध संरचना का सहज निर्माण कर देते हैं। पपीहा अपनी मौज में जब स्वाँति नक्षत्र की बूँद मिलने के आनन्द में पिऊ पिऊ बोलता है तो वे स्वर गीत हो उठते हैं। भँवरों को सबसे निकट से फूल सुनते हैं, भाव विभोर हो जाते हैं और शायद इसीलिये अपना पराग सिर्फ सौंपते ही नहीं उस पर इसका आलेपन भी उन पर कर देते हैं।
इसी धारणा और अवधारणा से उत्प्रेरित ये ५१ गीत मुझ में सहज ही में उतर आये हैं। त्रिपथगा गंगा का ही एक नाम है जो हिमालय के तीन स्रोतों से निकल कर आती है और देव प्रयाग में आकर मिल जाती है यहीं से यह गंगा हो जाती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि गीत में बहती है त्रिपथगा। इस गीत संग्रह में से एक गीत की ये पंक्तियाँ कहती हैं जिसका शीर्षक है - गीत में बहती है त्रिपथगा।
अक्षरों की, शब्द की, मन-भावना की
त्याग की, तप की, तपनमय साधना की
घोष की, उद्घोष की, धर्म के जय-घोष की
प्रेम की, सत-सत्य की, करुण रस सार की
सद्य हम स्नान कर लें
जयति जय जय गान कर लें
इन गीतों को संभवतः संगीतमय धुन और स्वर के साथ गाया जा सकता है। इन्हें अकेले, युगल के रूप में या कोरस में भी गाया जा सकता है। मैं यह नहीं जानता कि ये कौन से छन्द हैं? ये किस शास्त्रीय अनुशासन की फ्रेम में फिट होंगे, या नहीं होंगे पर ये सहज सी भ्रमर गुंजन जैसे हैं। एक और प्रेरणा इन में संलिप्त सी है - जैसे प्रसाद की कृति 'आँसू' में आँसू, महादेवी के काव्य में 'दीपक' उनके श्रेष्ठ आलम्बन ले कर मानवीकृत हुए हैं उसी तरह मेरे ये गीत कहीं कहीं कुछ सुनने, समझने और कहने लगते हैं। कहीं कहीं ये आप से सीधे सीधे संवाद भी करते लगेंगे।
मैंने इनसे कहा है :-
रस - सागर
भर - गागर
पद-पद नव-नागर छन्द भरो!
जन-जन का गौरव शीश धरो!
स्वर-वैभव क्षण क्षण कण्ठ जगे
ऐसा नित नवल विधान करो!
ऐ गीत मेरे तू गाता चल
ले ले तू सप्तक साध सरल
रामनारायण सोनी
९. ३.२५
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