गीत में भी घुन लगे
गीत में भी घुन लगे
बीज-से सुलने लगे
गा रहे जिसके कथानक
कान मूँदे वे अचानक
शून्य में आलाप पंगु हो गये हैं
जागरण के दीप प्रहरी, सो गये हैं
गीत की क्षुर धार बोथी
जल गई इस बार पोथी
मेंढकों का कूप में जग
यह जिन्दगी दो चार पग
लघु क्षितिज में स्वाँस बन्दी हो गये है
बीन के स्वर-साज सारे, खो गये हैं
खिड़कियाँ सूनी पड़ी है
शून्य से आँखें जुड़ी हैं
गीत की ये मन्द्र ध्वनियाँ
अक्षरों की क्षीण छबियाँ
वीथिका के पथ अनामी हो गये हैं
गीत थे उनके लिये, वे प्रवासी हो गये हैं
रामनारायण सोनी
६. ३ . २५
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