स्वाँस के तनु-तन्तु थकते
पर कथानक हैं अधूरे
गगन पथ के विकल संकुल
रश्मि के रस-रंग धूमिल
थिर नयन में
चिर थकन में
नील नभ में धूलि मलते
स्वाँस के तनु-तन्तु थकते
पर कथानक हैं अधूरे
बीन के स्वर रंध्र कहते
अब पवन मुझ में न बहते
स्वर विरागी
सब वीतरागी
आस के घन बिन्दु तकते
स्वाँस के तनु-तन्तु थकते
पर कथानक हैं अधूरे
होम की गीली समिध है
अर्चियाँ फैली विविध है
मौन परिमल
अश्रु अविरल
धूम्र के घन छद्म छलते
स्वाँस के तनु-तन्तु थकते
पर कथानक हैं अधूरे
रामनारायण सोनी
२८.४.२५
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