Monday, 11 September 2017

ओशो 1

पहला प्रवचन-(संसार पाठशाला है)

 पहला प्रश्न: भगवान, विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है। और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजी, और फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आप आज अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं।

भगवान, यह अनहद में बिसराम क्या है, यह हमें समझाने की कृपा करें।

 आनंद मैत्रेय!

विश्राम के लिए पक्षी घोंसला बनाए, इसमें तो कुछ भी अड़चन नहीं। क्योंकि घोंसले में किया गया विश्राम, आकाश में उड़ने की तैयारी का अंग है। आकाश से विरोध नहीं है घोंसले का। घोंसला सहयोगी है, परिपूरक है। सतत तो कोई आकाश में उड़ता नहीं रह सकता। देह तो थकेगी। देह को विश्राम की जरूरत भी पड़ेगी।

इसलिए घोंसला शुभ है, सुंदर है, सुखद है। इतना ही स्मरण रहे कि घोंसला आकाश नहीं है। सुबह उड़ जाना है; रैन बसेरा है। लक्ष्य तो आकाश ही है; घोंसला पड़ाव है। गंतव्य, मंजिल, वह तो अनंत आकाश है; वह तो सीमाओं के पार जाना है। क्योंकि जहां तक सीमा है, वहां तक दुख है; सीमा ही दुख है। सीमा में होना अर्थात कारागृह में होना। जितनी सीमाएं होंगी, उतना ही आदमी जंजीरों में होगा। सब सीमाएं टूट जाएं, तो सब जंजीरें गिर जाएं।

कारागृह से इस मुक्ति के उपाय का नाम ही धर्म है।

संसार का अर्थ है, कारागृह से चिपट जाना; कारागृह को पकड़ लेना; जंजीरों को आभूषण समझ लेना। तोड़ने की तो बात दूर, कोई तोड़े तो उसे तोड़ने न देना। सपनों को सत्य समझ लेना और रास्ते के पड़ावों को मंजिल मान कर रुक जाना। बस, संसार का इतना ही अर्थ है। संसार न तो दुकान में है, न बाजार में है; न परिवार में है, न संबंधों में है। संसार है इस भ्रांति में, जो पड़ाव को मंजिल मान लेती है। संसार है इस अज्ञान में, जो क्षण भर के विश्राम को शाश्वत आवास बना लेता है।

घोंसला बनाओ; जरूर बनाओ, सुंदर बनाओ, प्रीतिकर बनाओ। तुम्हारे सृजन की छाप हो उस पर। तुम्हारे व्यक्तित्व के हस्ताक्षर हों उस पर। फिर घोंसला हो, कि झोपड़ा हो, कि मकान हो, कि महल हो, अपनी सृजनात्मक ऊर्जा उसमें उंडेलो। मगर एक स्मरण कभी न चूके, सतत एक ज्योति बोध की भीतर जलती रहे: यह सराय है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, इसे छोड़ कर जाना है; जाना ही पड़ेगा। तो जिसे छोड़ कर जाना है, उसे पकड़ना ही क्यों? रह लो; जी लो; उपयोग कर लो। आग्रह न हो, आसक्ति न हो।

दो तरह के लोग हैं। एक हैं, जो संसार में रहते हैं और संसार में गहन आसक्ति निर्मित कर लेते हैं। दूसरे हैं, जो संसार से भाग खड़े होते हैं।

जिनको हमने सदियों तक संन्यासी कहा है, थे वे केवल भगोड़े। उन्हें हमने पूजा है; उनकी हमने अर्चना की है। उनके लिए हमने दीए जलाए, धूप बारी; उनके ऊपर हमने फूल चढ़ाए, केसर छिड़की। क्योंकि हमें लगा कि अपूर्व, अद्वितीय, असंभव कार्य उन्होंने कर दिखाया है। हमसे तो छूटता नहीं, और वे छोड़ कर चले गए!

लेकिन उनसे भी छूटा नहीं है। असल में कहीं पकड़ न जाएं, इस डर से भाग खड़े हुए हैं। छूटने में और छोड़ने में फर्क है। छूटना तो बोध की प्रक्रिया है; वह तो सम्यक जागरण है; उसकी सहज निष्पत्ति है।

दो फकीर एक जंगल में यात्रा करते थे, गुरु और शिष्य। बूढ़ा गुरु, युवा शिष्य। युवा शिष्य बहुत हैरान था! हैरान था इसलिए कि ऐसी बात उसने अपने गुरु में कभी देखी ही न थी। कुछ नई ही बात हो रही थी आज। गुरु बार-बार अपनी झोली में हाथ डाल कर कुछ टटोल लेता था। थोड़ी देर में फिर! थोड़ी देर में फिर! झोली में उसका जी अटका था। शिष्य सोचता था कि क्या झोली में है आज! उसे कभी चिंतित नहीं देखा। उसे कभी झोली में बार-बार झांकते नहीं देखा। आज क्या माजरा है!

फिर सांझ होने लगी, सूरज ढलने लगा। वे एक कुएं पर हाथ-मुंह धोने, थोड़ा विश्राम करने, थोड़ा कलेवा कर लेने को रुके। गुरु पानी भरने लगा। झोला उसने अपने शिष्य को दिया और कहा, जरा सम्हाल कर रखना!

ऐसा भी उसने कभी कहा न था। झोला यूं ही रख देता था। न मालूम कितने घाटों पर और न मालूम कितने कुओं पर रुकना हुआ था। आज क्या बात है! उत्सुकता जगी। जब गुरु पानी भरने लगा, तो शिष्य ने झांक कर झोले में देखा। सोने की एक ईंट झोले में थी! सब राज खुल गया। उसने ईंट को तो निकाल कर झोले के बाहर कुएं के पास फेंक दिया एक गङ्ढे में और उसी वजन का एक पत्थर झोले में रख दिया।

गुरु ने जल्दी से हाथ-मुंह धोया, नाश्ता किया। बीच-बीच में झोले पर नजर भी रखी। एक-दो बार चेताया भी शिष्य को कि झोले का खयाल रखना। शिष्य हंसा, उसने कहा, पूरा खयाल है; आप बिलकुल निष्फिक्र रहें। चिंता की अब कोई बात ही नहीं!

जैसे ही निपटे, चलने को आगे बढ़े, गुरु ने जल्दी से झोला वापस ले लिया। अक्सर तो यूं होता था कि झोला शिष्य को ही ढोना पड़ता था। आज गुरु शिष्य पर झोले का बोझ डालने को राजी न था! जल्दी से झोला अपने कंधे पर ले लिया। बाहर से ही टटोल कर देखा: वजन पूरा है; ईंट भीतर है। निश्चिंत हो चलने लगा।

फिर बार-बार कहने लगा, रात हुई जाती है। दूर किसी गांव का टिमटिमाता दीया भी दिखाई पड़ता नहीं! जंगल है। अंधेरा है। अमावस है। चोर, लफंगे, लुटेरे--कोई भी दुर्घटना घट सकती है। जब भी गुरु यह कहे, शिष्य हंसे।

आखिर गुरु ने दो मील चलने के बाद पूछा कि तू हंसता क्यों है?

शिष्य ने कहा, मैं इसलिए हंसता हूं कि अब आप बिलकुल निश्चिंत हो जाएं। आपकी चिंता का कारण तो मैं कुएं के पास ही फेंक आया हूं।

तब घबड़ा कर गुरु ने झोले में हाथ डाला। देखा तो पत्थर था! सोने की ईंट तो जा चुकी थी! क्षण भर को तो सदमा लगा। छाती की धक-धक रुक गई होगी। श्वास ठहरी की ठहरी रह गई होगी। लेकिन फिर बोध भी हुआ। बोध यह हुआ कि दो मील तक झोले में तो पत्थर था, लेकिन मैं यूं मान कर चलता रहा कि सोने की ईंट है, तो मोह बना रहा। जिंदगी भर भी अगर मैं यह मान कर चलता रहता कि सोने की ईंट है, तो मोह बना रहता। मोह ईंट में नहीं था, मेरी भ्रांति में था। मोह ईंट में होता, तो इन दो मीलों तक मोह के होने का कोई कारण न था; चिंता की कोई वजह न थी। मेरी आसक्ति मेरे भीतर थी, बाहर की ईंट में नहीं। जिंदगी भर भी आसक्त रह सकता था, अगर यह भ्रांति बनी रहती कि ईंट सोने की है। और तत्क्षण भ्रांति टूट गई, जैसे ही जाना कि ईंट पत्थर की है।

झोला वहीं गिरा दिया। खिलखिला कर हंसा। वहीं बैठ रहा। कहा, अब कहां जाना है? अब गांव वगैरह खोजने की कोई जरूरत नहीं। वैसे ही बहुत थके हैं। अब आज रात इसी वृक्ष के नीचे सो रहेंगे।

शिष्य ने कहा, अंधेरा है! अमावस है! चोर हैं, लुच्चे हैं, लफंगे हैं, लुटेरे हैं!

गुरु ने कहा, रहने दे। अब कुछ भेद नहीं पड़ता। अब अपने पास ईंट ही नहीं, अपने पास सोना ही नहीं, तो लूटने वाला भी क्या लूटेगा!

इसे मैं छूटना कहता हूं। छोड़ा नहीं, छूटा। एक बोध जगा। एक समझ गहरी हुई। एक बात साफ हो गई कि सब उपद्रव भीतर है, बाहर नहीं। बाहर तो सिर्फ बहाने हैं, निमित्त, खूंटियां, जिन पर हम अपने भीतर के उपद्रव टांग देते हैं। फिर धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, परिवार हो, प्रियजन हों, मित्र हों, देह हो, मन हो--कोई भी बहाना काम दे देगा। लेकिन अगर भीतर टांगने को ही कुछ न बचा हो, तो फिर सब बहाने रहे आएं, क्या फर्क पड़ता है! फिर बाजार में बैठो कि मरघट में, बराबर है।

वे जो भगोड़े हैं, उनसे संसार छूटा नहीं है; उन्होंने छोड़ा है। और दोनों शब्दों में उतना ही भेद है, जितना जमीन और आसमान में। छूटना तो बोध से होता है; छोड़ना भय से होता है। भय और बोध का क्या नाता? क्या संबंध? वे तो विपरीत हैं; उनका तो कभी मिलन होता ही नहीं। बोध और भय? भय तो पलता है अंधेरे में। और बोध जगता है उजेले में। बोध है सुबह; और भय है अमावस की रात। दोनों का कैसा मिलन?

वे जो भाग गए हैं छोड़ कर, छिप गए हैं जाकर पहाड़ियों में, गुफाओं में, वे सिर्फ भयभीत हैं, डरे हुए हैं। डर है कि संसार में अगर रहे, तो आसक्ति पकड़ लेगी।

मगर संसार ने कभी किसी को पकड़ा है? तुम कल न मरो,आज मर जाओ, तो संसार तुम्हें क्षण भर न रोकेगा--कि न जाओ; कि ठहरो; कि कुछ देर तो ठहरो! तुम्हारे बिना कैसे चलूंगा! कि तुम्हारे अभाव में, तुम्हारे बिना सब अस्तव्यस्त हो जाएगा, अराजकता हो जाएगी। तुम नहीं, तो फिर जिंदगी कहां! रुक जाओ, ठहर जाओ! थोड़ी देर और। जरा सम्हल लेने दो; परिपूरक खोज लेने दो; फिर चले जाना। ऐसी जल्दी क्या है?

कल के मरते आज मर जाओ, संसार को क्या पड़ी है! कुछ अंतर ही नहीं पड़ता। कितने लोग आए, कितने लोग गए! कितने लोग आते रहे, जाते रहे! कितने लोग आते रहेंगे, जाते रहेंगे! संसार अपनी जगह है। संसार तुम्हें पकड़ता नहीं। तुम संसार को पकड़े हुए हो।

इसलिए छोड़ कर कहां भाग रहे हो? अगर पकड़ने की आदत तुम्हारी है, तो तुम्हारे साथ चली जाएगी। उसे कैसे छोड़ोगे? वह तो भीतर है। तो हो सकता है, महल छोड़ दो; झोपड़ा पकड़ लोगे। सिंहासन छोड़ दो; लंगोटी पकड़ लोगे। तिजोरियां छोड़ दो, भिक्षापात्र पकड़ लोगे। राज्य छोड़ दो, कुछ अंतर न पड़ेगा, एक वृक्ष के नीचे बैठ रहोगे, उस पर कब्जा कर लोगे कि यह मेरा वृक्ष! इसके नीचे कोई और अड्डा न जमाए! किसी और की धूनी न लगे! पकड़ोगे तुम जरूर। क्योंकि पकड़ कहीं यूं जाती है! पकड़ तो केवल समझ से जाती है।

इसलिए मैं अपने संन्यासी को कहता हूं, भागना मत। भागना है भय। और भय तो कायरता है। और कायर तो संसार भी नहीं पा सकता, सत्य को क्या खाक पाएगा! इसलिए मेरे मन में भगोड़ों के प्रति कोई आदर नहीं, कोई सम्मान नहीं। वे चाहे कितने ही बड़े भगोड़े रहे हों, और चाहे उन्होंने कितने ही लोगों को प्रभावित कर दिया हो।

लोग तो अपने से विपरीत व्यक्ति से प्रभावित हो जाते हैं। एक आदमी सिर के बल खड़ा हो जाए और भीड़ लग जाएगी। अब यूं सिर के बल खड़ा होना कोई बड़ी बात नहीं। कोई भी मूढ़ कर सकता है। सच तो यह है, सिवाय मूढ़ के और कौन करेगा!

अगर परमात्मा को तुम्हें सिर के बल ही खड़ा करना था, तो उसने सिर में टांगें उगा दी होतीं। परमात्मा शीर्षासन में बहुत उत्सुक नहीं है। अगर परमात्मा को ही तुम्हें कांटों की सेज पर लिटाना होता, तो तुम्हारे साथ ही कांटों की सेज भेज दी होती; इंतजाम कर दिया होता। उसने तुम्हारे प्रवास के लिए पूरा इंतजाम करके भेजा है। अगर परमात्मा उत्सुक होता तुम्हारे उपवासों में, तो उसने तुम्हें भूखा रखने की कला ही सिखा दी होती। अरे, जो भूख दे सका, वह भूखापन नहीं दे सकता था? अगर परमात्मा उत्सुक होता कि तुम छोड़ दो प्रियजन, तुम छोड़ दो मित्रजन, तुम छोड़ दो परिवार, तुम छोड़ दो लोग, तो तुम्हें परिवार में और प्रियजनों में, मित्रों में पैदा ही क्यों करता? यूं ही जैसे आकाश से वर्षा होती है, तुम भी बरस गए होते!

जार्ज गुरजिएफ कहा करता था कि तुम्हारे महात्मा, तुम्हारे सभी महात्मा परमात्मा के दुश्मन मालूम होते हैं। परमात्मा एक काम करता है, तुम्हारे महात्मा उससे उलटा काम करने को बताते हैं!

लेकिन राज है। राज यह है कि परमात्मा तो तुम्हें सहज, स्वाभाविक बनाता है; महात्मा तुम्हें असहज, अस्वाभाविक बनाते हैं। क्योंकि असहज, अस्वाभाविक होकर ही तुम आकर्षण के बिंदु बनते हो। लोगों के लिए तुम्हारे प्रति सम्मान तभी पैदा होगा, जब तुम कुछ उलटा करो।

अमरीका में एक विचारक हुआ, राबर्ट रिप्ले। वह प्रसिद्ध होना चाहता था। कौन प्रसिद्ध नहीं होना चाहता? चाहता था सारी दुनिया उसे जान ले। गांव में एक बहुत बड़ा सरकस आया हुआ था। सोचा उसने कि सरकस इतना प्रसिद्ध है, जग-जाहिर है; इसके मैनेजर को जरूर कुछ सूत्र पता होंगे प्रसिद्धि के। तो मैनेजर से उसने अलग से मुलाकात ली और कहा कि मुझे भी कुछ राज बताओ! मैं भी प्रसिद्ध होना चाहता हूं!

मैनेजर ने यूं ही मजाक में कहा...। सरकस का ही मैनेजर था; धंधा ही मजाक का था, तमाशबीनी का था। उसने कहा, इसमें क्या खास बात है! तुम अपने सिर के आधे बाल कटा लो, और चुपचाप, बिना कुछ बोले, जमीन पर टकटकी बांधे पूरे न्यूयार्क की सड़कों पर चक्कर काटते रहो। तीन दिन बाद आना।

तीन दिन बाद वह आया, तो साथ में अखबारों की बहुत सी कटिंग भी लाया। क्योंकि अखबारों में तस्वीरें ही छप गईं। चर्चा हो गई गांव में घर-घर में कि यह कौन है आदमी! आधे सिर के बाल कटाए हुए! कौन प्रसिद्ध न हो जाएगा?

रिप्ले ने मैनेजर को बहुत धन्यवाद दिया और कहा, अब आगे के लिए कुछ और बताएं! न्यूयार्क में तो जलवा हो गया; डुंडी पिट गई। एक बच्चा ऐसा नहीं है, जो न जानता हो। गांव-गांव, आस-पास भी खबर फैलने लगी।

मैनेजर ने कहा, अब तुम ऐसा करो, एक बड़ा आईना खरीदो। उस आईने को अपनी कमर पर बांध लो। आईने में देखो, तो पीछे का रास्ता दिखाई पड़ेगा। और बस पीछे की तरफ चलो, आगे की तरफ नहीं। और सारे अमरीका का चक्कर लगा डालो।

और रिप्ले ने वही किया। और चक्कर पूरा होते-होते अमरीका में ही नहीं, सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया--यह कौन आदमी है!

और उससे कहा, तू बिलकुल चुप रहना। बोलना है ही नहीं! जितना चुप रहेगा, उतना ही अच्छा। बोले, तो कहीं बात न खुल जाए! बुद्धिमान आदमी का बोलना अच्छा, बुद्धू का चुप रहना अच्छा। क्योंकि बुद्धू चुप रहे तो बुद्धिमान मालूम होता है!

सो रिप्ले बिलकुल चुप रहा। लाख लोगों ने पूछा। मुस्कुराए! कुछ कहे ही न। अरे, राज की बातें कहीं कही जा सकती हैं! शब्दातीत! कहो भी तो कैसे कहो? अनिर्वचनीय! प्रवचन से तो मिलती नहीं। बोलने से तो मिलती नहीं। कहने से तो कही नहीं जाती। हस्तांतरणीय नहीं। कोई जानने वाला ही जान ले, तो जान ले।

और मजा तो तब हुआ, जब रिप्ले ने पाया कि कुछ उसके शागिर्द भी पैदा हो गए; उसके पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने भी छोटी-छोटी व्यवस्थाएं कर लीं। जिससे जैसा दर्पण बन सका, ले आया। अकेला नहीं, अब रिप्ले की एक कतार चलने लगी! और वे भी सब चुप। अरे जब गुरु ही चुप है, तो शिष्य भी चुप!

कुछ भी, जो सामान्य नहीं है, असामान्य है; जो स्वाभाविक नहीं है, अस्वाभाविक है; उससे लोग प्रभावित होते हैं। लोगों को प्रभावित करना अहंकार की बड़ी गहरी अभीप्सा है।

ये जो भगोड़े हैं, इनसे लोग प्रभावित हुए। इनसे प्रभावित होने का कुल कारण इतना था कि ये कुछ कर रहे थे, जो अस्वाभाविक था। स्वाभाविक आदमी से कौन प्रभावित होगा?

जापान का एक सम्राट सदगुरु की तलाश कर रहा था। बहुत तलाश की; सदगुरु न मिला सो न मिला। जो-जो नाम ज्ञात थे, परिचित थे, पहचाने थे, वहां-वहां गया, लेकिन तृप्ति न हुई। अपने बूढ़े वजीर से पूछा कि मैं तो युवा हूं, तुम तो बूढ़े हुए। तुम्हें तो कुछ पता होगा। कोई तो ऐसा आदमी होगा...।

वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहा, आदमी तो हैं, लेकिन तुम न पहचान सकोगे। क्योंकि सच्चा सदगुरु बिलकुल सहज, स्वाभाविक होगा। उसमें कोई सींग थोड़े ही निकले होते हैं, जो तुम पहचान लोगे! तुम तलाश कर रहे हो किसी उलटे-सीधे आदमी की। लोग तो मिलेंगे बहुत उलटे-सीधे। मगर जो अभी खुद ही उलटे-सीधे हैं, वे तुम्हें क्या लाख उपाय भी करें तो मार्गदर्शन दे सकेंगे? तुम्हें भी और अस्तव्यस्त कर देंगे। तुम वैसे ही अराजक अवस्था में हो, वे तुम्हें और अराजक कर देंगे। मैं एक आदमी को जानता हूं...।

सम्राट तो उत्सुक था। वजीर को कहा, मैं चलने को राजी हूं।

वे दोनों गए मिलने उस फकीर को। वजीर तो चरणों पर गिर पड़ा फकीर के, लेकिन सम्राट उस आदमी को देख कर इस योग्य न पाया कि इसके चरणों में गिरे। आदमी बिलकुल साधारण था। और काम भी क्या कर रहा था! लकड़ियां काट रहा था।

अब कहीं सदगुरु लकड़ी काटते हैं? कि कहीं महावीर लकड़ी काटते मिले जाएं! कि बुद्ध लकड़ी काटते मिल जाएं! सदगुरु कहीं लकड़ियां काटते हैं?

सम्राट ने अपने वजीर से कहा कि यह आदमी लकड़ियां काट रहा है! इसकी क्या खूबी है? वजीर ने कहा, इसकी यही खूबी है। इसी से पूछो कि इसकी साधना क्या है! तो पूछा फकीर से कि तेरी साधना क्या है?

फकीर कोई और न था, झेन सदगुरु था, बोकोजू। उसने कहा, मेरी कोई साधना नहीं। जब भूख लगती है, तो भोजन कर लेता हूं। और जब नींद आती है, तो सो जाता हूं। मेरी कोई और साधना नहीं है।

सम्राट ने कहा, लेकिन यह कोई साधना हुई? यह भी कोई साधना हुई? यह तो हम सभी करते हैं। जब भूख लगती है,भोजन करते हैं। जब नींद आती है, सो जाते हैं।

बोकोजू ने कहा कि नहीं। इतने जल्दी निष्कर्ष न लो। कई बार तुम्हें भूख नहीं लगती, और तुम भोजन करते हो। और कई बार तुम्हें भूख लगती है, और तुम भोजन नहीं करते। और कई बार तुम्हें नींद आती है, और तुम सोते नहीं। और कई बार तुम्हें नींद नहीं आती, और तुम सोने की चेष्टा करते हो। इतना ही नहीं, तुम जब भोजन करते हो, तब और भी हजार काम करते हो। यंत्रवत भोजन करते रहते हो, और मन न मालूम किन-किन लोकों में भागा रहता है! और जब तुम सोते हो, तब तुम सिर्फ सोते ही नहीं। कितने-कितने सपने देखते हो! कहां-कहां नहीं जाते! क्या-क्या नहीं करते! मन का व्यापार जारी रहता है। मैं जब भोजन करता हूं, तो सिर्फ भोजन ही करता हूं। बस, भोजन ही करता हूं। उस वक्त भोजन करने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब सोता हूं, तो सिर्फ सोता हूं; उस समय सोने के सिवाय बोकोजू में और कुछ भी नहीं होता। और जब मुझे नींद आती है, तो मैं एक क्षण भी टालता नहीं; तत्क्षण सो जाता हूं।

बोकोजू कहता, जब नींद खुल गई, तब ब्रह्ममुहूर्त।

तो कभी-कभी दोपहर तक सोया रहता। और कभी-कभी आधी रात तक जागा रहता। जब नींद आएगी, तब सोएगा। जब भूख लगी, तो भोजन करेगा। कभी-कभी दिन, दो दिन बीत जाते और भोजन न करता। वह उपवास न था। और कभी-कभी दिन में दो बार भोजन करता। इतना नैसर्गिक!

मगर ऐसे आदमी से कौन प्रभावित हो? हम तो उलटे-सीधे लोगों से प्रभावित होते हैं। इसलिए भगोड़ों ने मनुष्य को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। वे हमसे उलटे थे। और हमसे उलटे थे इसलिए, मैं तुमसे कहता हूं, हम से जरा भी भिन्न न थे। हम जैसे ही थे। बस, हम पैर के बल खड़े हैं; वे सिर के बल खड़े थे। हम सोने के पीछे दीवाने हैं; वे डरते थे कि कहीं सोना छू न जाए। हम स्त्रियों के पीछे भागे जा रहे हैं, वे स्त्रियों के प्रति पीठ करके भागे जा रहे थे। मगर भाग जारी थी। और दोनों का केंद्र स्त्री थी। एक स्त्री की तरफ भाग रहा है; एक स्त्री से भाग रहा है। मगर दोनों की नजर स्त्री पर अटकी है। एक कहता है कि स्त्री में ही स्वर्ग है। और एक कहता है, स्त्री नर्क का द्वार है। मगर दोनों के लिए स्त्री महत्वपूर्ण है। किसी के लिए स्वर्ग का द्वार; किसी के लिए नर्क का द्वार। मगर द्वार स्त्री ही है।

मगर स्त्री से छुटकारा नहीं है ऐसे। न पुरुष से छुटकारा है। न धन से छुटकारा है।

विश्राम बनाने के लिए, विराम में जाने के लिए पक्षी घोंसले बनाते हैं, मनुष्य झोपड़े बनाते हैं या महल बनाते हैं। कुछ बुरा नहीं। बस, इतनी ही याद रहे कि उन सीमाओं में आबद्ध न हो जाना। वे सीमाएं तुम्हारी सीमाएं नहीं हैं। कोई सीमा तुम्हारी सीमा नहीं है। रहो जरूर, मगर अतिथि की तरह रहना; आतिथेय मत हो जाना। मेहमान की तरह रहना; मेजबान न हो जाना। तो फिर तुम जहां हो, वहीं संन्यासी हो।

आनंद मैत्रेय! तुमने पूछा कि "विश्राम के लिए अनंत आकाश में उड़ने वाला पक्षी घास का छोटा सा घोंसला बनाता है...।'

वह उड़ने के लिए जरूरी है। उड़ने के लिए शक्ति संयोजित करनी होगी। जागने के लिए सोना होगा। भागने के लिए बैठना होगा। नहीं तो ऊर्जा विनष्ट हो जाएगी। वह घोंसला आकाश का दुश्मन नहीं है, संगी-साथी है; आकाश का हिस्सा है; आकाश ही है।

मगर कोई पक्षी घोंसले को पकड़ कर नहीं बैठ जाता। तुमने देखा! अंडे फूटते हैं; नए पक्षी पैदा होते हैं। रुकते हैं तब तक घोंसले में, जब तक उड़ने के योग्य नहीं हो जाते। और जिस दिन उड़े कि उड़े। फिर लौट कर आते ही नहीं। फिर घोंसले बनाएंगे, जब उनको खुद अंडे रखने होंगे।

जरूरत है, तो उपयोग करो। संसार का उपयोग करो।

संसार नहीं बांधता है। संसार से भागो मत, जागो।

तुम कहते हो, "और विश्राम के लिए आदमी ने पहले गुफा खोजी, फिर झोपड़ा और मकान बनाया। और आज आप अनहद में बिसराम की चर्चा शुरू कर रहे हैं...।'

यह अनहद में विश्राम अंतिम विश्राम है। यह आखिरी घोंसला है। फिर उसके पार और मकान नहीं बनाने पड़ते। शाश्वत घर मिल गया, फिर क्या मिट्टी के घरघूले बनाने! क्या फिर रेत के मकान बनाने! जो अभी बनाए और अभी गिरे! फिर क्या क्षणभंगुर में समय को व्यतीत करना है और व्यर्थ करना है! अनहद में बिसराम, दरिया की इस अदभुत सूचना का अंग है:

जात  हमारी  ब्रह्म  है, माता-पिता  है  राम।

गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम।।

इस सूत्र को समझ लो। यह सूत्र संन्यास का सार है।

"जात हमारी ब्रह्म है।'

जात का अर्थ होता है, जहां से हम जन्मे; जो हमारा वास्तविक जीवन-स्रोत है। इसलिए तुम्हारी जात हिंदू नहीं है, और मुसलमान नहीं है, और ईसाई नहीं है। क्योंकि बच्चा जब पैदा होता है, उसे पता ही नहीं होता कि हिंदू है, कि ईसाई है, कि मुसलमान है। बच्चा जब पैदा होता है, तो न तो संस्कृत बोलता है, न अरबी बोलता है, न लैटिन, न ग्रीक।

मैंने सुना है, एक फ्रेंच दंपति, जिनके बच्चे पैदा नहीं होते थे, एक अनाथ आश्रम से एक स्वीडिश बच्चे को गोद ले लिए। जिस दिन उन्होंने स्वीडिश बच्चे को गोद लिया, फ्रेंच दंपति ने, दोनों ने ही एक स्वीडिश शिक्षिका रख ली और स्वीडिश भाषा सीखने लगे। अचानक! पास-पड़ोस के लोगों ने पूछा कि क्या हुआ? स्वीडिश भाषा किसलिए सीख रहे हो? क्या स्वीडन में बस जाने का इरादा है? या कि स्वीडन की लंबी यात्रा पर जा रहे हो?

उन्होंने कहा, नहीं-नहीं। एक स्वीडिश बच्चे को गोद लिया है। इसके पहले कि वह बड़ा हो और स्वीडिश भाषा में बोलना शुरू करे, हमें कम से कम स्वीडिश तो सीख लेनी चाहिए। नहीं तो हम समझेंगे क्या खाक कि वह क्या बोल रहा है!

बच्चे न तो स्वीडिश बोलते हैं, न फ्रेंच, न हिंदी, न अंग्रेजी। बच्चों की कोई भाषा नहीं होती; शून्य उनकी भाषा होती है; मौन उनकी भाषा होती है। और उनकी कोई जात नहीं होती। हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं। सब जातें हम थोप देते हैं। और क्या गजब हुआ है! जातों पर जातें थोपे चले जाते हैं। हिंदू होने से ही काम नहीं चलता। फिर उसमें ब्राह्मण; फिर उसमें क्षत्रिय; फिर वैश्य; फिर शूद्र। इतने से भी काम नहीं चलता। फिर अब ब्राह्मणों में भी कोंकणस्थ और देशस्थ!

विनोबा भावे से किसी ने पूछा कि आप कोंकणस्थ ब्राह्मण हैं या देशस्थ? विनोबा ने अपनी सूझ-बूझ के हिसाब से ठीक ही उत्तर दिया, हालांकि मुझे कुछ बहुत ठीक नहीं लगता। उन्होंने कहा, न तो मैं कोंकणस्थ ब्राह्मण हूं, न देशस्थ। मैं तो स्वस्थ ब्राह्मण हूं।

बात तो ठीक है। लेकिन मेरा इतना ही निवेदन है कि इसमें पुनरुक्ति है। स्वस्थ, ब्राह्मण, दोनों का एक ही अर्थ होता है। स्वस्थ का अर्थ होता है, स्वयं में स्थित हो जाना। और ब्राह्मण का अर्थ होता है, स्वयं के ब्रह्म को जान लेना। इसलिए स्वस्थ ब्राह्मण, एक ही बात को कहने के लिए दो शब्द उपयोग कर रहे हो। उचित नहीं है। ब्राह्मण होना काफी है। स्वस्थ होना काफी है। स्वस्थ ब्राह्मण होने की कोई जरूरत नहीं है। एक ही बात को कहने के लिए दो शब्द क्यों उपयुक्त करने? क्यों उपयोग करना?

लेकिन यूं उनकी बात ठीक है कि कोंकणस्थ नहीं, देशस्थ नहीं। लेकिन खतरा यह है कि कुछ स्वस्थ ब्राह्मण पैदा हो सकते हैं। ऐसे ही तो जातियां पैदा होती हैं। विनोबा के पीछे चलने वाले ब्राह्मण कहने लग सकते हैं कि हम स्वस्थ ब्राह्मण हैं। फिर एक जाति पैदा हो गई।

क्या ब्राह्मण होना पर्याप्त नहीं है? क्या ब्रह्म होना काफी नहीं है? क्या ब्रह्म से और कोई परिष्कार हो सकता है? क्या ब्रह्म को सुंदर बनाया जा सकता है, कुछ और शब्द उस पर आरोपित कर दिए जाएं तो?

दरिया ठीक कहते हैं: "जात हमारी ब्रह्म है।'

तो न तो हम हिंदू हैं, न मुसलमान, न ईसाई; न ब्राह्मण, न शूद्र,न क्षत्रिय, न वैश्य। हम ब्रह्म से आए हैं। ब्रह्म का अर्थ है, जीवन का स्रोत; इस विराट अस्तित्व का मूल स्रोत। उस ब्रह्म से हमारा आना हुआ है, और उसी में हमें लौट जाना है। और जिसने इन दोनों के बीच--आने और जाने के बीच, आवागमन के बीच--उसको पहचान लिया, फिर उसका आवागमन मिट जाता है। जिसने जन्म और मृत्यु के बीच अपने भीतर के ब्रह्म को पहचान लिया, फिर उसे दुबारा आने की कोई जरूरत नहीं रह जाती।

यह जीवन है ही इसलिए, पाठशाला है, कि हम अपने भीतर के ब्रह्म के प्रति सजग हो सकें, जाग सकें, पहचान सकें।

पहचान के लिए एक गणित खयाल में रखना। मछली सागर में पैदा होती है, लेकिन जब तक सागर में रहेगी, उसे पता ही नहीं चलेगा कि सागर क्या है। खींच लो सागर से! कहो किसी मछुए से, निकाल ले मछली को सागर के बाहर। छोड़ दो तट पर, धूप में, तपी हुई रेत पर। तड़पने दो थोड़ा। और फिर उसे वापस सागर में छोड़ दो। मछली वही है, सागर वही है, लेकिन सब बात बदल गई। अब मछली जानती है कि सागर क्या है। पहले नहीं जानती थी। अब बोध हुआ। अब पता चला कि सागर ही मेरा जीवन है, मेरा आनंद है, मेरा उत्सव है। अब पता चला, सागर ही मेरा संगीत है; सागर ही मेरा नृत्य है। सागर से क्षण भर को छूटना, और नर्क और पीड़ा और दुर्दिन और दुर्भाग्य की शुरुआत! हम ब्रह्म के सागर से आते हैं; मछलियां हैं, जो संसार के तट पर फेंक दी गईं। जान-बूझ कर फेंकी गई हैं, ताकि पाठ सीख लें। पाठ सीखने का एक ही उपाय है कि थोड़ी देर के लिए बिछुड़न हो जाए। अगर मिलन कभी टूटे ही न, तो बोध नहीं होता।

एक बहुत बड़े अमीर ने जीवन के अंतिम दिनों में तय किया कि सब मैंने पा लिया--धन, पद, प्रतिष्ठा; हीरों के ढेर लग गए--लेकिन सुख तो मैंने जाना नहीं, क्षण भर को न जाना। धन को पाने में दुख उठाया। धन पाकर कुछ सुख मिलता नहीं। धन तो है, लेकिन सुख कहां! और जीवन की अंतिम घड़ी पास आने लगी। सूरज ढलने लगा है। अब ढला, तब ढला। यह उतरने लगा पश्चिम में सूरज। कभी भी रात आ जाएगी। इसके पहले कि मौत आए, सुख को तो जानना ही है।

तो उसने एक बहुत बड़ी झोली में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात भरे; अपने घोड़े पर सवार हुआ। बहुत फकीरों के पास गया। और फकीरों से कहा, यह सारा धन देने को तैयार हूं। सुख की एक झलक दिखा दो!

मगर कौन सुख की झलक दिखाए? कैसे सुख की झलक दिखाए? उत्सुक तो फकीर भी थे उसके धन को लेने में। और जो उसके धन को लेने में उत्सुक थे, वे क्या खाक सुख की झलक दिखाएंगे! अभी तो उनको खुद भी झलक नहीं मिली! अभी तो वे भी सोच रहे हैं कि धन मिल जाए, तो शायद झलक मिले! और आंख के होते हुए अंधे हैं। इस आदमी को धन मिल गया और धन का झोला लिए घूम रहा है कि मैं देने को तैयार हूं किसी को भी। एक झलक, बस एक झलक! एक नजर भर कर देख लूं सुख क्या है, कि सब निछावर कर दूंगा।

फिर एक सूफी फकीर की उसको खबर मिली। लोगों ने कहा, हम तो न दे सकेंगे झलक। सच तो यह है कि तुम्हारा धन देख कर हमारे भीतर तुमने लालच जगा दिया। हमारी न मालूम कितने दिनों की तपश्चर्या और साधना डगमगा दी। तुम भागो यहां से! ले जाओ अपना धन! हम पहुंचे ही जा रहे थे, पहुंचे ही जा रहे थे, कि तुमने चुका दिया। तुम खुद भी चूके और हमको भी चुका दिया। हां, एक फकीर है, वह जरा उलटा-सीधा फकीर है। शायद वही तुम्हारे काम आए।

तो गया धनपति। अपने घोड़े को रोका उस फकीर के वृक्ष के नीचे। फकीर को अपनी पूरी कथा सुनाई। फकीर ने गौर से सुनी। धनपति ने अपना झोला भी खोल कर दिखाया। हीरे-जवाहरातों का ढेर था उसमें। अरबों-खरबों के होंगे। फकीर ने कहा, झोला बंद कर!

झोला धनपति ने बंद किया। लगा कि फकीर है तो कुछ पहुंचा हुआ। और दूसरे फकीरों को तो झोले में एकदम रस आ गया था। एकदम उनकी आंखों से लार टपकने लगी थी। वे तो भूल ही गए थे इसको सुख देने की बात। वे तो खुद ही के सुख पाने की आकांक्षा में तल्लीन हो गए थे।

इस फकीर ने कहा, बंद कर ये कचरे को! झोला बंद कर! फिर कुछ सुख दिखाने की बात बने। धनपति ने झोला बंद किया। यह फकीर जंचा। जिसने जीवन भर धन इकट्ठा किया हो, उसको ऐसा ही आदमी जंचता है। और जैसे ही उसने झोला बंद करके एक तरफ रखा, फकीर उठा और झोला लेकर भाग खड़ा हुआ!

एक क्षण को तो धनपति को कुछ समझ में ही नहीं आया कि क्या हो रहा है! किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। जब होश आया, तब तक तो फकीर यह गया वह गया! नौ दो ग्यारह हो गया! उसको तो जगह परिचित थी। वह जंगल परिचित था; वह पास में ही बसा गांव परिचित था। इस धनपति को तो सब अपरिचित था। भागा एकदम उसके पीछे; बेतहाशा भागा। घोड़े को भी छोड़ गया। भूल ही गया घोड़े की बात। चिल्लाता हुआ, कि लुट गया! बर्बाद हो गया! मेरी जिंदगी भर की मेहनत पर पानी फेर दिया। अरे, यह कोई फकीर नहीं है; यह बदमाश है; लुच्चा है; चोर है! चिल्लाता जाए, भागता जाए: पकड़ो-पकड़ो!

सारा गांव खड़े होकर देख रहा था। गांव तो फकीर को जानता था। वह कई करतब इस तरह के पहले कर चुका था! उसके कामों से तो लोग परिचित थे कि वह कुछ उलटा-सीधा करता है! कुछ किया होगा। कोई पकड़ने में उत्सुक नहीं दिखाई पड़ रहा था। और धनपति और भी हैरान था। फिर तो वह गालियां पूरे गांव को देने लगा कि पूरा गांव बदमाशों का, लुच्चों का है। यह फकीर तुम्हारा नेता है या क्या बात है! पकड़ते क्यों नहीं?

लोग हंस रहे थे, खिलखिला रहे थे। मगर उसके प्राणों पर बनी थी। हांफता, भागता, फकीर का पीछा करता रहा। फकीर वापस पहुंच गया उसी झाड़ के नीचे जहां घोड़ा खड़ा था अब भी। झोले को वहीं रख दिया जहां से उठाया था, झाड़ के पीछे जाकर खड़ा हो गया छिप कर।

थोड़ी ही देर बाद धनपति भी हांफता, पसीने से लथपथ,जिंदगी में कभी ऐसा दौड़ा नहीं था। मौका ही न आया था। झोला देखा, एकदम उठा कर छाती से लगा लिया और कहा कि हे परमात्मा! धन्य है तू। किन शब्दों में तेरा आभार करूं! आत्मा को ऐसी शांति मिल रही है, ऐसा सुख मिल रहा है, कभी नहीं मिला!

फकीर बोला, मिला? चलो थोड़ा दर्शन तो हुआ। झलक मिली?

यह धनपति को पता नहीं था कि वह झाड़ के पीछे छिपा है। फकीर बाहर आ गया; अपनी जगह बैठ गया। उसने कहा, देख, तू कहता था झलक दिखा दो, दिखा दी। अब अपने घर जा। अब आगे काम तू कर। तब धनपति को बोध आया। चरणों पर गिरा। कहा कि मैं पहचाना नहीं। लुच्चा-लफंगा चिल्लाया, गालियां दीं, पूरे गांव को गालियां दीं। अब मैं समझा कि वे गांव के लोग क्यों तुम्हें नहीं पकड़ रहे थे। वे तुम्हें जानते होंगे। मगर तुमने क्या गजब किया!

फकीर ने कहा, इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था। यही परमात्मा की विधि है, और यही समस्त सदगुरुओं की विधि है। तुमसे जब तक हटा न लिया जाए, तब तक तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। अचानक तुम्हें सुख मिल गया! यह झोला तो तुम्हारे पास सदा से था। पहले छाती से लगा कर परमात्मा को धन्यवाद नहीं दिया। आज क्यों धन्यवाद दे रहे हो? थोड़ी देर को मछली सागर से छूट गई।

यह संसार एक शिक्षण की व्यवस्था है। इसलिए जिन्होंने तुमसे कहा है संसार छोड़ दो, वे वे ही लोग हैं, जो तुम्हारे बच्चों को समझाएं कि स्कूल छोड? दो; भाग खड़े होओ!

यह स्कूल है, इसे छोड़ना नहीं है। यहां कुछ सीखना है। यहां परमात्मा से विरह हो गया हमारा। वह जो हमारा मूल स्रोत है, उदगम है, ब्रह्म है, उससे हमारा नाता टूट गया है। इस विरह को भोगना है, ताकि फिर से मिलन की संभावना बन सके। और विरह के बाद जो मिलन है, उसका मजा ही और है।

"जात हमारी ब्रह्म है, माता-पिता है राम।'

जात भी हमने खो दी। न मालूम क्या-क्या बन कर बैठ गए हैं। जमीन पर कोई तीन सौ धर्म हैं। और तीन सौ धर्मों में कम से कम तीन हजार छोटी-छोटी जातियां, उप-जातियां, और न मालूम क्या-क्या...कितना जाल फैला दिया है! और जिनको हम भले लोग कहें, उनके भीतर भी वही जाल है।

शंकराचार्य जैसे व्यक्ति को, जिनको भारतीय सोचते हैं वेदांत की पराकाष्ठा, उनको भी एक शूद्र ने छू दिया, तो वे नाराज हो गए। शंकराचार्य! पानी फेर दिया सब वेदांत पर; भूल गए सब बकवास कि जगत माया है और ब्रह्म सत्य है। तत्क्षण पता चला शूद्र सत्य है; ब्रह्म वगैरह कोई सत्य नहीं। एक शूद्र ने छू दिया। भूल गए ज्ञान; भूल गए चौकड़ी! एकदम क्रुद्ध हो गए और कहा कि मूढ़, शूद्र होकर तुझे इतनी समझ नहीं कि ब्राह्मण को छू दिया? और मैं अभी गंगास्नान करके आ रहा हूं!

स्नान करके वे चढ़ ही रहे थे दशाश्वमेध की सीढ़ियां, तभी उस शूद्र ने छू दिया। सुबह-सुबह का अंधेरा। अब मुझे फिर स्नान करना पड़ेगा!

उस शूद्र ने कहा, स्नान आप जरूर करिए। मगर इसके पहले कि स्नान करें, मेरे कुछ सवालों का जवाब दे दें। एक तो यह कि अगर संसार माया है, तो किसने किसको छुआ? अगर मैं हूं ही नहीं, अगर यह देह भ्रम है, तो दो भ्रम एक-दूसरे को छू सकते हैं? और अगर छू भी ले भ्रम भ्रम को, तो क्या हर्जा है? और तुम्हारा भ्रम पवित्र, और मेरा भ्रम अपवित्र? कुछ तो संकोच करो! कुछ तो लाज करो! कुछ तो अपने कहे का खयाल करो! थूके को इतनी आसानी से तो न चाटो! फिर मैं यह भी पूछता हूं कि गंगा में स्नान करने से शरीर पवित्र हुआ कि आत्मा पवित्र हुई? पानी शरीर को छुएगा कि आत्मा को? अगर शरीर पवित्र हुआ है, तो शरीर क्या पवित्र हो सकता है? क्योंकि शरीर तो मिट्टी है। और तुम्हीं तो समझाते हो कि शरीर में कुछ भी नहीं है।

No comments:

Post a Comment